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________________ भगवई चहा कज्जमाणे एगयओ तिण्णि परमाणुपोग्गला, एगयओ तिपएसिए खंधे भवइ; अहवा एगयओ दो परमाणुपोग्गला, एगयओ दो दुपएसिया खंधा भवंति। पंचहा कज्जमाणे एगयओ चत्तारि परमाणुपोग्गला, एगयओ दुपएसिए खंधे भवइ । छहा कज्जमाणे छ परमाणुपोग्गला भवंति ॥ ७४. सत्त भंते! परमाणुपोग्गला एगयओ साहणंति, साहणित्ता किं भवइ ? गोयमा ! सत्तपएसिए खंधे भवइ । से भिज्जमाणे दुहा विजाब सत्ता वि कज्जइ दुहा कज्जमाणे एगयओ परमाणुपोग्गले, एगयओ छप्पएसिए खंधे भवइ; अहवा एगयओ दुपएसिए खंधे, एगयओ पंचपएसिए खंधे भवइ; अहवा एगयओ तिपएसिए खंधे, एगयओ चउपएसिए खंधे भवइ । तिहा कज्जमाणे एगयओ दो परमाणुपोग्गला, एगयओ पंचपएसिए खंधे भवइ; अहवा एगयओ परमाणुपोग्गले, एगयओ दुपएसिए खंधे, एगयओ चउपएसिए खंधे भवइ; अहवा एगयओ परमाणुपोग्गले, एगयओ दो तिपएसिया खंधा भवंति; अहवा एगयओ दो दुपएसिया खंधा, एगयओ तिपएसिए खंधे भवइ । चहा कज्जमाणे एगयओ तिण्णि परमाणुपोग्गला, एगयओ चउप्पएसिए बंधे भवइ; अहवा एगयओ दो परमाणुपोग्गला, एगयओ दुपएसिए खंधे, एगयओ तिपएसिए खंधे भवइ; अहवा एगयओ परमाणुपोग्गले, एगयओ तिण्णि दुपएसिया बंधा भवंति । पंचहा कज्जमाणे एगयओ चत्तारि परमाणुपोग्गला, एगयओ तिपएसिए खंधे भवइ; अहवा एगयओ तिण्णि परमाणुपोग्गला, एगयओ दो दुपए Jain Education International ३१ त्रयः चतुर्धा क्रियमाणः एकतः परमाणुपुद्गलाः, एकतः त्रिप्रदेशिकः स्कन्धः भवति, अथवा एकतः द्वौ परमाणुपुद्गलौ, एकतः द्वौ द्विप्रदेशिको स्कन्धौ भवतः । पञ्चधा क्रियमाणः एकतः चत्वारः परमाणुपुद्गलाः एकतः द्विप्रदेशिकः स्कन्धः भवति । षड्ढा क्रियमाणः षट् परमाणुपुद्गलाः भवन्ति । सप्त भदन्त ! परमाणुपुद्गलाः एकतः संहन्यन्ते, संहत्य किं भवति ? गौतम! सप्तप्रदेशिकः स्कन्धः भवति । सः भिद्यमानः द्विधा अपि यावत् सप्तधा अपि क्रियते द्विधा क्रियमाणः एकतः परमाणुपुद्गलः, एकतः षट्प्रदेशिकः स्कन्धः भवति, अथवा एकतः द्विप्रदेशिकः स्कन्धः, एकतः पञ्चप्रदेशिकः स्कन्धः भवति, अथवा एकतः त्रिप्रदेशिकः स्कन्धः, एकतः चतुष्प्रदेशिकः स्कन्धः भवति । त्रिधा क्रियमाणः एकः द्वौ परमाणुपुद्गलौ, एकतः पञ्चप्रदेशिकः स्कन्धः भवति, अथवा एकतः परमाणुपुद्गलः, एकतः द्विप्रदेशिकः स्कन्धः, एकतः चतुष्प्रदेशिकः स्कन्धः भवति, अथवा एकतः परमाणुपुद्गलः, एकतः द्वौ त्रिप्रदेशिको स्कन्धौ भवतः अथवा एकः द्वौ द्विप्रदेशिको स्कन्धौ, एकतः त्रिप्रदेशिकः स्कन्धः भवति । चतुर्धा क्रियमाणः एकतः त्रयः परमाणुपुद्गलाः, एकतः चतुष्प्रदेशिकः स्कन्धः भवति, अथवा एकतः द्वौ परमाणुपुद्गलौ, एकतः द्विप्रदेशिकः स्कन्धः, एकतः त्रिप्रदेशिकः स्कन्धः भवति, अथवा एकतः परमाणुपुद्गलः, एकतः त्रयः द्विप्रदेशिकाः स्कन्धाः भवन्ति । पञ्चधा क्रियमाणः एकतः चत्वारः परमाणुपुद्गलाः, एकतः त्रिप्रदेशिकः स्कन्धः भवति, अथवा एकतः त्रयः परमाणुपुद्गलाः, एकतः द्वौ द्विप्रदेशिको For Private & Personal Use Only श. १२ : उ. १ : सू. ७४ चार भागों में विभक्त होने पर एक ओर तीन स्वतंत्र परमाणु- पुद्गल, दूसरी ओर त्रिप्रदेशी स्कन्ध होता है अथवा एक ओर दो स्वतंत्र परमाणु- पुद्गल, दूसरी ओर दो द्विप्रदेशी स्कन्ध होते हैं। पांच भागों में विभक्त होने पर एक ओर चार स्वतंत्र परमाणु- पुद्गल, दूसरी ओर एक द्विप्रदेशी स्कन्ध होता है। छह भागों में विभक्त होने पर छह स्वतंत्र परमाणु - पुद्गल हो जाते हैं। ७४. भंते! सात परमाणु- पुद्गल एकत्र संहत होते हैं, उस संहति से क्या निष्पन्न होता है। गौतम! सप्त प्रदेशी स्कंध निष्पन्न होता है। वह टूटने पर दो अथवा यावत् सप्त भागों में विभक्त होता है। दो भागों में विभक्त होने पर एक ओर एक स्वतंत्र परमाणु- पुद्गल दूसरी ओर छह प्रदेशी स्कंध होता है अथवा एक ओर द्विप्रदेशी स्कंध, दूसरी ओर पांच प्रदेशी स्कंध होता है अथवा एक ओर त्रिप्रदेशी स्कंध, दूसरी ओर चतुष्प्रदेशी स्कंध होता है। तीन भागों में विभक्त होने पर एक ओर दो स्वतंत्र परमाणु- पुद्गल दूसरी ओर पांच प्रदेशी स्कंध होता है, अथवा एक ओर एक स्वतंत्र परमाणु- पुद्गल, दूसरी ओर द्विप्रदेशी स्कंध, तीसरी ओर चतुष्प्रदेशी स्कंध होता है अथवा एक ओर एक स्वतंत्र परमाणु - पुद्गल, दूसरी ओर दो त्रिप्रदेशी स्कंध होते हैं अथवा एक ओर दो द्विप्रदेशी स्कंध, दूसरी ओर त्रिप्रदेशी स्कंध होता है। चार भागों में विभक्त होने पर एक ओर तीन स्वतंत्र परमाणु- पुद्गल, दूसरी ओर चार प्रदेशी स्कंध होता है अथवा एक ओर दो स्वतंत्र परमाणु- पुद्गल, दूसरी ओर द्विप्रदेशी स्कंध, तीसरी ओर त्रिप्रदेशी स्कंध होता है अथवा एक ओर एक स्वतंत्र परमाणु - पुद्गल, दूसरी ओर तीन द्विप्रदेशी स्कन्ध होते हैं। पांच भागों में विभक्त होने पर एक ओर चार स्वतंत्र परमाणु- पुद्गल, दूसरी ओर त्रिप्रदेशी स्कंध होता है अथवा एक ओर तीन स्वतंत्र परमाणु- पुद्गल दूसरी ओर दो www.jainelibrary.org
SR No.003596
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 04 Bhagvai Terapanth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Acharya, Mahapragna Acharya
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2007
Total Pages514
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size14 MB
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