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________________ ९० अ०२: वैतालीय : श्लोक ४१-४७ सूयगडो १ ४१.अहिगरणकरस्स भिक्खुणो वयमाणस्स पसज्झ दारुणं । अछे परिहायई बहू अहिंगरणं ण करेज्ज पंडिए ।१६। ४२. सीओदग पडिदुगंछिणो अपडिण्णस्स लवावसक्कियो। सामाइयमाह तस्स जं जो गिहिमत्तेऽसणं ण भुंजई ।२०। ४३.ण य संखयमाहु जोवियं तह वि य बालजणो पगभई बाले पावेहि मिज्जई इइ संखाय मुणो ण मज्जई।२१। अधिकरणकरस्य भिक्षोः, ४१. कलह करने वाले, तिरस्कारपूर्ण और वदतः प्रसह्य दारुणम् । कठोर वचन बोलने वाले भिक्षु का अर्थः परिहीयते बहुः, परम अर्थ नष्ट हो जाता है, इसलिए अधिकरणं न कुर्यात् पंडितः ।। पण्डित भिक्षु को कलह नहीं करना चाहिए। शीतोदकस्य प्रतिजुगुप्सिनः, ४२. शीतोदक (सजीव जल)" न पीने अप्रतिज्ञस्य लवावष्वष्किनः । वाले, निष्काम, प्रवृत्ति से दूर रहने सामायिकमाहुः तस्य यद्, वाले" और जो गृहस्थ के पात्र में यो गृह्यमत्रे अशनं न भुङ्क्ते ।। भोजन नहीं करता, उस साधक के सामायिक होता है। न च संस्कृतमाहः जीवितं, ४३. (टूटे हुए) जीवन-सूत्र को जोड़ा नहीं तथाऽपि च बालजनः प्रगल्भते ।। जा सकता। फिर भी अज्ञ मनुष्य (हिंसा बाल: पापैर्मीयते, आदि करने में) धृष्ट होता है। वह इति संख्याय मुनिन माद्यति ।। अज्ञ (अपने हिंसा आदि आचरणों द्वारा जनित) पाप-कर्मों से भरता जाता है यह जानकर मुनि मद नहीं करता । छन्देन प्रलीयते इयं प्रजा, ४४. बहुत माया वाली, मोह से ढकी हुई बहुमाया मोहेन प्रावृता । यह जनता स्वेच्छा से विभिन्न गतियों विकटेन प्रलीयते ब्राह्मणः, में पर्यटन करती है। मुनि सरल भाव शीतोष्णं वचसा अध्यासीत ।। से संयम में लीन रहता है और वचन (मन और काया) से शीत और उष्ण को सहन करता है। ४४. छंदेण पलेतिमा पया बहुमाया मोहेण पाउडा। वियडेण पलेति माहणे सीउण्हं वयसा हियासए ।२२। ४५. कुजए अपराजिए जहा अक्खेहि कुसलेहिं दीवयं । कडमेव गहाय णो कलि णो तेयं णो चेव दावरं ।२३। कुजयोऽपराजितो यथा, अक्षैः कुशलैः दीव्यन् । कृतमेव गृहीत्वा नो कलिं, नो त्रेतं नो चैव द्वापरम् ॥ ४६. एवं लोगम्मि ताइणा बुइए जे धम्मे अणुत्तरे । तं गिण्ह हियं ति उत्तम कडमिव सेसऽवहाय पंडिए ।२४। एवं लोके त्रायिणा, उक्तो यो धर्मः अनुत्तरः । तं गृहाण हितं इति उत्तम, कृतमिव शेषमपहाय पंडितः ॥ ४५-४६. जैसे अपराजित द्यूतकार कुशल चूतकारों के साथ खेलता हुआ कृत दाव को ही लेता है, कलि, त्रेता या द्वापर को नहीं लेता। इसी प्रकार इस लोक में त्रायी (महावीर) के द्वारा कथित जो अनुत्तर धर्म है उसको कृत दाव की भांति हितकर और उत्तम समझकर स्वीकार करे। जैसे सफल द्युतकर शेष सभी दावों को छोड़कर केवल कृत को ही लेता है, उसी प्रकार पंडित मुनि, सब कुछ छोड़कर, धर्म को ही ग्रहण करे। ४७. उत्तर मणुयाण आहिया गामधम्म इति मे अणुस्सुयं । जंसो विरया समुट्ठिया कासवस्स अणुधम्मचारिणो ।२५॥ उत्तरा: मनुष्याणां आख्याता:, ग्राम्यधर्माः इति मया अनुश्रुतम् । यस्मिन् विरताः समुत्थिता:, काश्यपस्य अनुधर्मचारिणः ।। ४७. मैंने परंपरा से यह सुना है"-ग्राम्य धर्म (मैथुन) मनुष्यों के लिए सब विषयों में प्रधान" कहा गया है। किंतु काश्यप (महावीर या ऋषभ)" के द्वारा आचरित धर्म का अनुचरण करने वाले मुनि" उत्थित होकर उससे विरत रहते हैं। Jain Education Intemational For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003592
Book TitleAgam 02 Ang 02 Sutrakrutang Sutra Suyagado Terapanth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Acharya, Mahapragna Acharya, Dulahrajmuni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year1984
Total Pages700
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_sutrakritang
File Size14 MB
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