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________________ ६२६ णिज्झरबहुल-णिरह णिज्झरबहुल (निर्भरबहुल) ज १११८ इणिमज्जाव (नि-मज्जय) णिमज्जावेइ ज ३।६८ णिट्ठियट्ठ (निप्टितार्थ) प ३६।६३,६४ णिमुग्गजला (निमग्नजला) ज ३।६७ से १०१, णिडाल (ललाट) ज २०१५;३।३६,३६,४७,१३३ णिण्णग (निन्नग) प ११८६ णिम्मम (निर्मम) ज २१७०,५१५,४६,५८ णिण्णथल (निम्नस्थल) ज ७।११२॥५ णिम्मल (निर्मल) प २।३०,३१ ज ११८,२३,३१; णिण्णथलय (निम्नस्थलक) सू १०।१२६।५ २।१५; ४।१२५; ५।६२, ७।१७८ णिण्णुण्णय (निम्नोन्नत) ज २११३१ णिम्माणणाम (निर्माणनामन्) प २३।३८,१२८ णिण्हइया (निह्नविका) प ११६८ णिम्माय (निर्मात) ज ३।१ णितंब (नितम्ब) ज ११५१, ३१६१,१३७,४।१७४, णिम्मिय (निर्मित) ज ३।३५ १७५.१७६,१८२,१८८ णिम्मेर (निर्मर्याद) ज २११३५ णित्थारण (निस्तारण) ज ३११०६ इणियंस (नि- वस्) णियंसंति ज २।१०० णिदा (दे०) प ३५।१।१,३५।१६ णियंसेइ ज २१६६ णिदाया (दे०) प ३५।१७,१८,२०,२२,२३ णियंसण (निवसन) प २।४१ णिदाह (निदाघ) सु १०।१२४।२ ‘णियंसाव ( निवासय) णिसावेंति ज ३।२११ निद्दा (निद्रा) प २३।१४,२६,२७,१३४ १५५, णियंसावेत्ता (निवास्य) ज ३।२११ १७७,१८० णियंसेत्ता (न्युष्य) ज २१६६ णिवाणिद्दा (निद्रानिद्रा) प २३।१४ णियग (निजक) ज २।६४;३।३,१८७,१८८ णिद्ध (स्निग्ध) प १।९।३१,५११५४,२११; सू २०१७ १११५६,६०; १३।२२।१,२,२८।२६,३२,६६ ‘णियच्छ (निर्+दा) णियच्छति प २३।३ ज २।१५,३।३,२४,३५, ७।१७८ णियत (नियत) ज ३।८१ णिद्धत (निति) प २।३१ णियतिया (नयतिकी) प १७।११,२२,२३ णिद्धया (स्निग्धता) प १३।२२।१ णियत्थ (दे०) ज ३।१२५,१२६ णिद्धाइत्ता (निर्धाव्य) ज २।१३४ णियम (नियम) प ११२०,२३,२६,२६, ६।११४, इणिद्धाव (निर-धाव) णिद्धाइस्संति ज २।१३४, ११६; १०।२,११।५३,५७,५६,६६,६६।१; १४६ २१४९६,६६,१००,१०३; २२।४८,५१,६८, णिप्पंक (निष्पक) ज १८,२३ ६६,७१ से ७४; २३।१०,१२,२४।१४।२५।२, णिप्पच्चक्खाणपोसहोववास ४;२७।६२८।१६,३८,६५,९८ से १०१,३६।५६ (निष्प्रत्याख्यानपौषधोपवास) ज २११३५ ज ७।५०,५३,१६६ सू १८।३ /णिप्फज्ज (निर- पद्) णिप्फज्जइ ज २१६ णियमा (नियमा) ज ७।३२।१ सू २०१६ णिप्फत्ति (निष्पत्ति) ज ३।१६७/६ णियय (नियत) ज १।११,४७,३।२२६; ४।२२, णिफाइय (निष्पादित) ज ३।१२० ५४,६४,१०२,१५६; १२२,२६ णि फायय (निष्पादक) ज ३।११६ णियय (निजक) सू १६।२२।१४ णिप्फावग (निष्पावक) ज २।३७ णियया (नियता) ज ४११५७।१ णिब्भय (निर्भय) ज ३११२६,५।५८ णियर (निकर) ज २।१५ णिभिज्जमाण (निभिद्यमान) ज ४।१०७ णिरइ (निऋति) ज ७।१२०,१३०,१८६।४ णिभ (निभ) ज ३।३०,१७८ सू१०८३ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003555
Book TitleUvangsuttani Part 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Acharya, Mahapragna Acharya
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year1989
Total Pages1178
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, & Canon
File Size22 MB
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