SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 115
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ 12] [नन्दीसूत्र अपने घर ले गया / उत्तमोत्तम वस्त्राभूषणों से एवं भोजनादि से उसका सत्कार किया। घर में ही रहने का आग्रह किया / श्रेणिक को तो कहीं निवास करना ही था, वह उसो सेठ के यहाँ ठहर गया। सौभाग्यवश उसके पुण्य से सेठ की धन-सम्पत्ति, व्यापार एवं प्रतिष्ठा दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती गई तथा खोई हुई साख पुनः प्राप्त हो गई / परम अानन्द का अनुभव करते हुए सेठ ने कुछ ही दिनों के बाद श्रेणिक का विवाह अपनी सुयोग्य पुत्री नंदा के साथ कर दिया। पत्नी के साथ श्रेणिक सुखपूर्वक ससुराल में रहने लगा। कुछ ही समय के बाद नंदा गर्भवती हुई और यथाविधि गर्भ का संरक्षण करने लगी। इधर बिना बताए श्रेणिक के चले जाने से राजा प्रसेनजित बहुत दुःखी हुए और चारों दिशाओं में उसकी खोज के लिए आदमी भेज दिये। पता लगने पर राजा ने कुछ सैनिक श्रेणिक को लिवा लाने के लिए वेन्नातट भेजे / सैनिकों ने जाकर श्रेणिक से प्रार्थना की-"महाराज प्रसेनजित आपके वियोग में बहुत व्याकुल हैं / कृपा करके आप शीघ्र ही राजगृह पधारें / " श्रेणिक ने राजपुरुषों की प्रार्थना स्वीकार करके राजगृह जाने का निश्चय किया तथा अपनी पत्नी नंदा की सहमति लेकर और अपना परिचय विस्तृत लिखकर एक दिन राजगृह की ओर प्रस्थान किया। इधर नंदा के गर्भ में देवलोक से च्युत होकर आए हुए जीव के पुण्य-प्रभाव से एक दिन नंदादेवी को दोहद उत्पन्न हुआ कि-'मैं एक महान् हाथी पर आरूढ़ होकर नगर-जनों को धन-दान और अभय दान दूं।' मन में यह भावना आने पर नंदा ने अपने पिता से अपनी इच्छा को पूर्ण करने को प्रार्थना की। पिता ने सहर्ष पुत्री के दोहद को पूर्ण किया। यथासमय नंदा की कुक्षि से एक अनुपम बालक ने जन्म लिया / बाल-रवि के समान सम्पूर्ण दिशाओं को प्रकाशित करने वाले बालक का जन्मोत्सव मनाया गया तथा उसका नाम 'अभयकुमार' रखा गया / समय व्यतीत हो चला तथा अभय कुमार ने प्रारंभिक ज्ञान से लेकर अनेक शास्त्रों का अभ्यास करते हुए समस्त कलानों का भी पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया। एक दिन अकस्मात ही अभयकुमार ने अपनी माता से पूछा-'माँ ! मेरे पिता कौन हैं और कहाँ निवास करते हैं ?' नंदा ने उपयुक्त समय समझकर अभयकुमार को उसके पिता श्रेणिक का परिचय-पत्र बताया तथा आद्योपान्त्य सारा वृत्तान्त भी कह सुनाया / पिता का परिचय पाकर अभयकुमार को अतीव प्रसन्नता हुई और वह उसी समय राजगृह जाने को व्यग्न हो उठा / माता के समक्ष उसने अपनी इच्छा व्यक्त करते हुए सार्थ के साथ राजगृह जाने की आज्ञा माँगी / नंदादेवी ने अभयकुमार के साथ स्वयं भी चलना चाहा। परिणामस्वरूप अभयकुमार अपनी माता सहित सार्थ के साथ राजगृह की ओर चल दिया। चलते-चलते राजगृह के बाहर पहुँचे। अभयकुमार ने अपनी माता को सार्थ की सुरक्षा में, नगर के बाहर एक सुन्दर स्थान पर छोड़कर स्वयं नगर में प्रवेश किया / यह जानने के लिये कि शहर का वातावरण कैसा है और किस प्रकार राजा के समक्ष पहुँचा जा सकता है। नगर में प्रविष्ट होते ही अभयकुमार ने देखा कि एक जलरहित कुएं के चारों ओर लोगों की भीड़ इकट्ठी हो रही है। अभयकुमार ने एक व्यक्ति से लोगों के इकट्ठे होने का कारण पूछा। उस ने बताया- "इस सूखे कुएं में राजा की स्वर्ण-मुद्रिका गिर गई है और राजा ने घोषणा की है कि जो व्यक्ति कूप के तट पर खड़ा रहकर अपने हाथ से अँगूठी निकाल देगा उसे महान् पारितोषिक Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003499
Book TitleAgam 31 Chulika 01 Nandi Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorDevvachak
AuthorMadhukarmuni, Kamla Jain, Shreechand Surana
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1982
Total Pages253
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy