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________________ आठवां उद्देशक] 415 किसी के द्वारा प्रक्षिप्त किया गया हो और व्याख्याकारों ने इसे मौलिक पाठ समझ कर ज्यों-त्यों करके संगति करने की कोशिश की हो। व्याख्या में यह भी कहा गया है कि एक दिन पूर्ण पाहार करने वाला 'प्रकामभोजी' है, अनेक दिन पूर्ण पाहार करने वाला 'निकामभोजी' है और 32 कवल से भी अधिक खाने वाला 'अतिभोजी है। यहां एक प्रश्न उपस्थित होता है कि बत्तीस कवल के प्राहार से जो संपूर्ण माप कहा गया है वह प्रत्येक बार के भोजन की अपेक्षा से है या अनेक बार के भोजन की अपेक्षा से ? तथा दूध, छाछ आदि पेय पदार्थों का समावेश इन 32 कवल में किस प्रकार होता है ? समाधान-प्राचारशास्त्रों के अवलोकन से यह स्पष्ट हो जाता है कि दिन में एक बार भोजन करना ही भिक्षु का शुद्ध उत्सर्ग प्राचार है / आगमों में अनेक जगह अन्य समय में आहार करने का जो विधान है, उसे आपवादिक विधान समझना चाहिए / आपवादिक आचरण को सदा के लिए प्रवृत्ति रूप में स्वीकार कर लेना शिथिलाचार है। अतः कारणवश अनेक बार या सुबह शाम आहार करना ही अपवादमार्ग है। उत्सर्गमार्ग तो एक बार खाने का ही है। अतः प्रागमोक्त एक बार के प्रौत्सर्गिक आहार करने की अपेक्षा यह विधान है। जितने आहार से पेट पूर्ण भर जाय, पूर्ण तृप्ति हो जाय अथवा जिससे भूख रहने का या और कुछ खाने का मन न हो, ऐसी संपूर्ण मात्रा को 32 कवल में विभाजित कर लेना चाहिए / इसमें दूध रोटी फल आदि सभी को समाविष्ट समझना चाहिए। अनुमान से जितने-जितने कवल प्रमाण भूख रखी जाय, उतनी-उतनी ऊनोदरी समझनी चाहिए। समान्यतया उत्सर्गमार्ग से भिक्षु का प्राहार विगयरहित होता है, अतः रोटी आदि की अपेक्षा 32 कवल समझना और भी सरल हो जाता है। इसी के आधार से यह फलित होता है कि कारण से अनेक बार किये जाने वाले आहार का कुल योग 32 कवल होना चाहिए / अतः अनेक बार आहार करना हो तो 32 कवलों को विभाजित करके समझ लेना चाहिए / अनेक दिनों तक एक वक्त विगयरहित सामान्य आहार करके कुल खुराक का माप रोटी की संख्या में कायम किया जा सकता है। सूत्र 1 2-4 ___ आठवें उद्देशक का सारांश स्थविर गुरु आदि की आज्ञा से शयनासनभूमि ग्रहण करना / पाट आदि एक हाथ से उठाकर सरलता से लाया जा सके, वैसा ही लाना / उसकी गवेषणा तीन दिन तक की जा सकती है और स्थविरवास के अनुकूल पाट की गवेषणा पांच दिन तक की जा सकती है एवं अधिक दूर से भी लाया जा सकता है। एकलविहारी वृद्ध भिक्षु के यदि अनेक प्रकार के प्रोपग्रहिक उपकरण हों तो उन्हें भिक्षाचारी यादि जाते समय किसी की देखरेख में छोड़कर जाना एवं पुनः आकर उसे सूचित करके ग्रहण करना / Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003494
Book TitleAgam 26 Chhed 03 Vyavahara Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Trilokmuni, Devendramuni, Ratanmuni
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1982
Total Pages287
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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