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________________ 370] [व्यवहारसूत्र (3) उपकरणों का परिकर्म कार्य-सीना, जोड़ना, रोगानादि लगाना। (4) वस्त्र, रजोहरण आदि धोना। (5) रजोहरण आदि उपकरण बनाकर देना। (6) प्रतिलेखन आदि कर देना / इत्यादि अनेक कार्य यथासम्भव समझ लेने चाहिए। इन्हें आगाढ़ परिस्थितियों के बिना परस्पर करना करवाना साधु-साध्वियों को नहीं कल्पता है एवं करने-करवाने पर गुरुचौमासी प्रायश्चित्त आता है। प्राचार्य आदि पदवीधरों के भी प्रतिलेखना आदि सेवा कार्य केवल भक्ति प्रदर्शित करने के लिये साध्वियां नहीं कर सकती हैं / यदि प्राचार्य आदि इस तरह अपना कार्य अकारण करवावें तो वे भी गुरुचौमासी प्रायश्चित्त के पात्र होते हैं। तात्पर्य यह है कि साथ में रहने वाले साधु जो सेवाकार्य कर सकते हों तो साध्वियों से नहीं कराना चाहिए, उसी प्रकार साध्वियों को भी जब तक अन्य साध्वियां करने वाली हों तब तक साधुओं से अपना कोई भी कार्य नहीं करवाना चाहिए। सर्पदंशचिकित्सा के विधि-निषेध 21. निग्गथं च णं राओ वा वियाले वा दोहपुट्ठो लूसेज्जा, इत्थी वा पुरिसस्स ओमावेज्जा, पुरिसो वा इत्थीए प्रोमावेज्जा, एवं से कप्पइ, एवं से चिट्टइ, परिहारं च से नो पाउणइ, एस कप्पो थेर-कप्पियाणं। एवं से नो कप्पइ, एवं से नो चिट्ठइ, परिहारं च से पाउणइ, एस कप्पे जिणकप्पियाणं / 21. यदि किसी निर्ग्रन्थ या निर्ग्रन्थी को रात्रि या विकाल (सन्ध्या) में सर्प डस ले और उस समय स्त्री निर्ग्रन्थ की और पुरुष निर्ग्रन्थी की सर्पदंश चिकित्सा करे तो इस प्रकार उपचार कराना उनको कल्पता है / इस प्रकार उपचार कराने पर भी उनकी निर्ग्रन्थता रहती है तथा वे प्रायश्चित्त के पात्र नहीं होते हैं / यह स्थविरकल्पी साधुओं का आचार है। जिनकल्प वालों को इस प्रकार उपचार कराना नहीं कल्पता है, इस प्रकार उपचार कराने पर उनका जिनकल्प नहीं रहता है और वे प्रायश्चित्त के पात्र होते हैं। यह जिनकल्पी साधुओं का आचार है। विवेचन--बृहत्कल्पसूत्र के छ8 उद्देशक में 6 प्रकार की कल्पस्थिति कही गई है, अर्थात् 6 प्रकार का आचार कहा गया है। वहां पर स्थविरकल्पी और जिनकल्पी का आचार भिन्न-भिन्न सूचित किया है / उस प्राचार-भिन्नता का एक उदाहरण इस सूत्र में स्पष्ट किया गया है। दोनों के प्राचार में मुख्य अन्तर यह है कि स्थविरकल्पी यथावसर शरीरपरिकर्म, औषधउपचार तथा परिस्थिति वश किसी भी अपवादमार्ग का अनुसरण कर सकते हैं, किन्तु जिनकल्पी दृढ़तापूर्वक उत्सर्गमार्ग पर ही चलते हैं। वे किसी भी प्रकार का औषध-उपचार, शरीरपरिकर्म, Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003494
Book TitleAgam 26 Chhed 03 Vyavahara Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Trilokmuni, Devendramuni, Ratanmuni
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1982
Total Pages287
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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