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________________ पांचवां उद्देशक] ___ उद्दे. तीन और पांच के इन सूत्र-विधानों में प्राचारप्रकल्प का जो महत्त्व बताया गया है, उसे लक्ष्य में रखकर एवं अनुप्रेक्षा करके यदि उसकी रचना के विषय में निर्णय किया जाय तो सहज ही यह निर्णय हो जाता है कि इस व्यवहारसूत्र के रचयिता स्थविर भद्रबाहुस्वामी ने या उनके बाद के किसी स्थविर ने 'पाचारप्रकल्प' की रचना नहीं की है किन्तु यह गणधररचित है और प्रारंभ से ही जिनशासन के सभी साधु-साध्वियों को आवश्यक रूप से अध्ययन कराया जाने वाला शास्त्र है / वर्तमान में यह शास्त्र आचारांग+निशीथ उभय सूत्रों का सूचक है। दशाश्रुतस्कंध के नियुक्तिकार ने नियुक्ति की प्रथम गाथा में ही स्थविर श्री प्रथम भद्रबाहुस्वामी को वंदन-नमस्कार करते हुए उन्हें 'तीन छेदसूत्रों (दशाश्रुतस्कंध, बृहत्कल्प और व्यवहारसूत्र) की रचना करने वाले' ऐसे विशेषण से विभूषित किया है और श्रीभद्रबाहुस्वामी ने अपने द्वारा रचित (निर्यढ) इस व्यवहारसूत्र में सोलह बार प्राचारप्रकल्प का निर्देश करते हए अनेक प्रकार के विधान किए हैं। इतना स्पष्ट होते हुए भी ऐतिहासिक भ्रान्तियों के कारण वर्तमान के इतिहासज्ञ इस सूत्र के रचनाकार और उनके समय के विषय में अपने संदिग्ध विचार प्रस्तुत करते हैं, यह अत्यंत खेद का विषय है। प्राचारप्रकल्प संबंधी व्यवहारसूत्र के विधानों से यह स्पष्ट हो जाता है कि अध्ययन-व्यवस्था में आचारांग-निशीथसूत्र को अर्थ-परमार्थ सहित कंठस्थ करना प्रत्येक साधु-साध्वी के लिये अत्यंत आवश्यक है तथा स्वाध्याय आदि के द्वारा उसे कण्ठस्थ रखना भी आवश्यक है / जो कोई भी श्रमण या श्रमणी इसके अध्ययन की योग्यता वाले नहीं होते हैं या इसका अध्ययन नहीं करते हैं अथवा अध्ययन करने के बाद उसका स्वाध्याय न करके विस्मृत कर देते हैं, वे ही श्रमण या श्रमणी जिनशासन के किसी भी पद को ग्रहण करने में या पूर्व ग्रहीत को धारण करने के अयोग्य होते हैं, अर्थात् उन्हें कोई पद नहीं दिया जा सकता है और पहले से किसी पद पर हों तो उन्हें पद से हटा दिया जाता है। वे सिंघाड़ाप्रमुख बनकर भी विचरण करने का अधिकार नहीं रखते हैं तथा किसी भी प्रकार की गणव्युत्सर्गसाधना अर्थात् एकलविहार, संभोग-प्रत्याख्यान आदि साधनाएँ भी नहीं कर सकते हैं। __ प्राचारप्रकल्प का धारक भिक्षु ही जघन्य गीतार्थ या जघन्य बहुश्रत कहा गया है। वही स्वतंत्र विहार या गोचरी के योग्य होता है। अबहुश्रुत या अगीतार्थ की गवेषणा से प्राप्त पदार्थों के उपयोग करने का भी भाप्य में निषेध किया गया है एवं प्रायश्चित्त कहा गया है। वर्तमान में पूर्वो का ज्ञान विच्छेद मानना तो आगमसम्मत है, किन्तु अन्य सूत्रों का विच्छेद होना नहीं कहा जा सकता है / अतः क्षेत्र या काल की अोट लेकर इन व्यवहारसूत्रकथित विधानों के आचरण का विच्छेद मानना सर्वथा अनुचित है / क्योंकि वर्तमान में दीक्षित होने वाले अनेक नवयुवक श्रमण-श्रमणियों को यदि योग्य अध्यापन कराने वाले मिलें तो वे तीन वर्ष में इतना अध्ययन कंठस्थ अवश्य कर सकते हैं। किन्तु अत्यंत खेद के साथ यह कहना पड़ता है कि अध्ययन के क्षेत्र में उदासीनता के कारण विद्यमान लगभग दस हजार (10,000) जैन साधु-साध्वियों में केवल दस साधु-साध्वियां भी इस प्राचारप्रकल्प को अर्थसहित कण्ठस्थ धारण करने वाले नहीं हैं। फिर भी समाज में अनेक प्राचार्य, उपाध्याय हैं और अनेक पद प्राप्ति के लिये लालायित रहने वाले भी हैं। संघाड़ाप्रमुख बनकर विचरण करने वाले भी अनेक साधु-साध्वी हैं और वे स्वयं को पागमानुसार विचरण करने वाले भी मानते हैं / किन्तु आगमानुसार अध्ययन, विचरण तथा गच्छ के पदों की व्यवस्था किस Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003494
Book TitleAgam 26 Chhed 03 Vyavahara Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Trilokmuni, Devendramuni, Ratanmuni
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1982
Total Pages287
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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