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________________ चौया उद्देशक] [211 यदि वे आज्ञा दें तो उन्हें अन्यगण को श्रुतग्रहण के लिये स्वीकार करना कल्पता है / यदि वे आज्ञा न दें तो उन्हें अन्यगण को श्रुतग्रहण के लिये स्वीकार करना नहीं कल्पता है। विवेचन--इस सूत्र में यह विधान है कि यदि कोई साधु ज्ञानादि की प्राप्ति या विशेष संयम की साधना हेतु अल्पकाल के लिये किसी अन्यगण के आचार्य या उपाध्याय की उपसंपदा स्वीकार करना चाहे तो उसके लिए यह आवश्यक है कि वह अपने प्राचार्य की स्वीकृति ले। प्राचार्य समीप में न हों तो उपाध्याय की, उनके अभाव में प्रवर्तक की, उनके अभाव में स्थविर की, उनके अभाव में गणी की, उनके अभाव में गणधर की और उनके अभाव में गणावच्छेदक की स्वीकृति लेकर के ही अन्यगण में जाना चाहिए / अन्यथा वह प्रायश्चित्त का पात्र होता है। अध्ययन आदि की समाप्ति के बाद पुनः वह भिक्षु स्वगच्छ के प्राचार्य के पास प्रा जाता है। क्योंकि वह सदा के लिये नहीं गया है। सदा के लिये जाने का विधान आगे के सूत्रों में किया गया है। आचार्य, उपाध्याय या गणावच्छेदक आदि पदवीधर भी विशिष्ट अध्ययन हेतु अन्य प्राचार्य या उपाध्याय के पास जाना चाहें तो वे भी जा सकते हैं किन्तु गच्छ की व्यवस्था बराबर चल सके, ऐसी व्यवस्था करके अन्य योग्य भिक्षु को अपना पद सौंप कर और फिर उनकी प्राज्ञा लेकर के ही जा सकते हैं किन्तु आज्ञा लिये बिना वे भी नहीं जा सकते हैं। पद सौंपने एवं प्राज्ञा लेने के कारण इस प्रकार हैं१. अध्ययन करने में समय अधिक भी लग सकता है। 2. गच्छ की चिंता से मुक्त होने पर ही अध्ययन हो सकता है। 3. गच्छ की व्यवस्था के लिये, विनयप्रतिपत्ति के लिये एवं कार्य की सफलता के लिये आज्ञा लेना आवश्यक होता है। अध्ययन समाप्त होने पर पुनः स्वगच्छ में पाकर पद ग्रहण कर सकते हैं। यहां इतना विशेष ज्ञातव्य है कि प्राचार्यादि की स्वीकृति मिलने पर साधु तो अकेला भी विहार कर अन्यगण में जा सकता है, किन्तु साध्वी अकेली नहीं जा सकती है। उसे स्वीकृति मिलने पर भी कम से कम एक अन्य साध्वी के साथ ही अन्यगण में जाना चाहिए। प्राचार्य आदि की प्राज्ञा लेना या अन्य आवश्यक विधि का पालन करना साधु के समान ही जानना चाहिए / विशेष यह है कि प्रवर्तिनी की आज्ञा भी लेना आवश्यक होता है। सांभोगिक-व्यवहार के लिए अन्यगण में जाने की विधि 23. भिक्खू य गणाओ अवक्कम्म इच्छेज्जा अन्नं गणं संभोगपडियाए उवसंपज्जित्ताणं विहरित्तए। नो से कप्प त्ता आयरियं वा जाव गणावच्छेहयं वा अन्नं गणं संभोगपडियाए उपसंपज्जित्ताणं विहरित्तए। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003493
Book TitleAgam 25 Chhed 02 Bruhatkalpa Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Trilokmuni, Devendramuni, Ratanmuni
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1982
Total Pages217
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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