SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 48
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ सम्राट् भरत के 98 लघु भ्राता प्रवजित हो गए तब भरत के अन्तर्मानस में यह विचार उबुद्ध हुआ कि मेरे पास यह विराट वैभव है, यह वैभव अपने स्वजनों के भी काम नहीं आया तो निरर्थक है। भरत ने अपने भाइयों को पहले भोग के लिये निमंत्रण दिया। जब उन्होंने यह स्वीकार नहीं किया तो पांच सौ गाड़ियों में भोजन की सामग्री लेकर जहां भगवान ऋषभदेव विचर रहे थे वहाँ पहुँचे और वह भोजनसामग्री ग्रहण करने के लिये प्रार्थना की। भगवान ऋषभदेव ने कहा कि श्रमणों के लिये बना हुप्रा आहार श्रमण ग्रहण नहीं कर सकते और साथ ही यह राजपिण्ड है अतः श्रमण ले नहीं सकते। भरत सोचने लगे कि मेरी कोई भी वस्तु काम नहीं आयेगी। उस समय भरत को चिन्तित देखकर शक्रेन्द्र ने कहा कि आप जो आहार प्रादि लाये हैं, यह वृद्ध और गुणाधिक श्रावकों को समर्पित करें। भरत को सुझाव पसन्द आया और वह प्रतिदिन गुणज्ञ श्रावकों को प्राहार देने लगा। भरत ने कहा-पाप अपनी माजीविका की चिन्ता से मुक्त बनें / शास्त्रों का स्वाध्याय करें तथा मुझे 'वर्द्धते भयं, माहण माहण' का उपदेश दें / अर्थात् भय बढ़ रहा है, हिंसा मत करो, हिंसा मत करो। भोजन करने वालों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। जो श्रावक नहीं थे, वे भी प्राने लगे। भरत ने उन श्रावकों की परीक्षा की और कागिणीरत्न से उन्हें चिह्नित किया। 'माहण-माहण' की शिक्षा देने से वे ब्राह्मण (माहण-ब्राह्मण) कहलाए देव, गुरु और धर्म के प्रतीक के रूप में तीन रेखाएं की गई थीं। वे ही रेखाएं आगे चलकर यज्ञोपवीत में परिणत हो गई। 225 ____ महापुराण के अनुसार ब्राह्मणवर्ण की उत्पत्ति इस प्रकार है-सम्राट् भरत षट्खण्ड को जीत कर जब प्राये तो उन्होंने सोचा कि बौद्धिक वर्ग, जो अपनी आजीविका की चिन्ता में लगा हना है, उसे आजीविका की चिन्ता से मुक्त किया जाय तो वह जनजीवन को योग्य मार्गदर्शन प्रदान कर सकता है। उन्होंने योग्य व्यक्तियों के परीक्षण के लिये एक उपाय किया। भरत स्वयं प्रावास में चले गये। मार्ग में हरी घास थी। जिन लोगों में विवेक का प्रभाव था वे हरी घास पर चलकर भरत के पास पहुँच गये पर कुछ लोग, जिनके मानस में जीवों के प्रति मनुकम्पा थी, वे मार्ग में घास होने के कारण भरत के पास उनके आवास पर नहीं गए, प्रतीक्षाघर में ही बैठे रहे। भरत ने जब उनसे पूछा कि भाप मेरे पास क्यों नहीं पाए ? उन्होंने बताया कि जीवों की विराधना कर हम कैसे प्राते ? सम्राट् भरत ने उनका सम्मान किया और 'माहण' अर्थात् ब्राह्मण की संज्ञा से सम्बोधित किया। भरत के जीवन से सम्बन्धित अन्य कई प्रसंग अन्यान्य ग्रन्थों में पाए हैं, पर विस्तार भय से हम उन्हें यहाँ नहीं दे रहे हैं / वस्तुतः सम्राट् भरत का जीवन एक आदर्श जीवन था, जो युग-युम तक मानवसमाज को पावन प्रेरणा प्रदान करता रहेगा। चतुर्थ वक्षस्कार चतुर्थ वक्षस्कार में चुल्ल हिमवन्त पर्वत का वर्णन है / इस पर्वत के ऊपर बीचों-बीच पद्म नाम का एक सरोवर है। इस सरोवर का विस्तार से वर्णन किया गया है / गंगा नदी, सिन्धु नदी, रोहितांशा नदी प्रभति नदियों का भी वर्णन है / प्राचीन साहित्य, चाहे वह वैदिक परम्परा का रहा हो या बौद्ध परम्परा का, उनमें इन नदियों का वर्णन विस्तार के साथ मिलता है। ऋग्वेद में 21 नदियों का वर्णन है। उनमें मं प्रमुखता दी है। ऋग्वेद के नदीसूक्त में मंगा, सिन्धु को देवताओं के समान रथ पर चलती हुई कहा गया है। 226 उनमें देवत्व की प्रतिष्ठा भी की गई है / 227 विसुद्धिमग्ग में गंगा, यमुना, सरयू, सरस्वती, अचिरवती, माही 225. पावश्यकचूणि पृ. 213-214 226. सुखं रथं युयुजे। - ऋग्वेद 10-75-9 227. ऋग्वेद 6,8 [ 47 ] Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003486
Book TitleAgam 18 Upang 07 Jambudveep Pragnapti Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Chhaganlal Shastri, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1986
Total Pages480
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size13 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy