________________ 401 सूर्यप्रज्ञप्तिसूत्र उ.--ता जया णं एए दुवे सरिया सवभंतरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरंति तया णं जंबुद्दोवस्स दोवस्स तिष्णि पंच चक्कभागे ओभासेंति जाव पगासेंति, तं जहा ता एगे वि सरिए एगं दिवड्ढं पंच चक्कभागं ओभासेइ जाव पगासेइ, ता एगे वि सूरिए एग दिवढं पंच चक्कभागं ओभासेइ जाव पगासेइ, तया णं उत्तमकट्ठपत्ते उक्कोसए अट्ठारसमुहुत्ते दिवसे भवइ जहणिया दुवालसमुहुत्ता राई भवइ, ता जया णं एए दुवे सूरिया सवबाहिरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरंति तया णं जंबुद्दीवस्त दोवस्स दोणि पंच चक्कभागे ओभासेंति जाव पगासेंति, ता एगे वि सरिए एग पंच चक्कवालभागं ओभासेइ जाव पगासेइ, ता एगे वि सूरिए एगं पंच चक्कवालभाग ओभासेइ जाव पगासेइ, तया णं उत्तमकट्ठपत्ता उक्कोसिया अट्ठारसमुहुत्ता राई भवइ जहण्णए दुवालसमुहत्ते दिवसे भवह। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org