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________________ तृतीय प्रात चंदिम-सूरियाणं प्रोभासखेत्तं उज्जोयखेत्तं तावखेत्तं पगासखेतं च 24. प.–ता केवइयं खेत्तं चंदिम-सूरिया ओभासंति, उज्जोति तति पगासेंति ? आहिएत्ति वएज्जा, उ.-तत्थ खलु इमाओ बारस पडिवत्तीओ पण्णत्ताओ तं जहातत्थेगे एवमासु१. ता एगं दोवं एगं समुद्द चंदिम-सूरिया ओभासेंति उजोति तति, पगासेंति' एगे एवमाहंसु, एगे पुण एवमाहंसु२. ता तिणि दोवे, तिणि समुद्दे चंदिम-सूरिया ओभासेंति जाव पगासेंति एगे एवमाहंसु, एगे पुण एवमाहंसु३. ता अद्धचउत्थे दोवे, अद्धचउत्थे समुद्दे चंदिम-सूरिया ओभासेंति जाव पगासेंति, एगे __एवमाहंसु, एगे पुण एवमाहंसु-- 4. ता सत्तदोवे, सत्तसमुद्दे चंदिम-सूरिया ओभासेंति, जाव पगार्सेति, एगे एवमाहंसु, एगे पुण एवमाहंसु५. ता दसदीवे, दससमुद्दे चंदिम-सूरिया ओभासेंति जाव पगासेंति, एगे एवमासु, एगे पुण एवमाहंसु६. ता बारसदोवे, बारससमुद्दे चंदिम-सूरया ओभासेंति जाव पगासेंति, एगे एवमाहंसु, एगे पुण एवमाहंसु७. ता बायालीसं दीवे, बायालीसं समुद्दे चंदिम सूरिया ओभासेंति जाव पगासेंति एगे एवमाहंसु, अवभासयन्ति, तत्रावभासो ज्ञानस्यापि व्यवह्रियते अतस्तव्यवच्छेदार्थमाह-उद्योतयन्ति, स चोद्योतो यद्यपि लोके भेदेन प्रसिद्धो यथा सूर्यगत ग्रातप इति, चन्द्रगत: प्रकाश इति, तथाप्यातपशब्दश्चन्द्रप्रभायामपि वर्तते, यदुक्तम् 'चन्द्रिका कौमुदी ज्योत्स्ना, तथा चन्द्रगतःस्मृतः इति' प्रकाशशब्दः सूर्यप्रभायामपि, एतच्च प्रायो बहना सुप्रतीतंतत एतदर्थप्रतिपत्यर्थमुभयसाधारणं भूयोऽप्येकार्थकद्वयमाह तापयन्ति प्रकाशयन्ति ग्राख्याता इति / -संस्कृतटीका Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003484
Book TitleAgam 16 17 Suryaprajnapti Chandraprajnapti Sutra - Swe Mu Pu Agam 16 17
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages300
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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