________________ परिशिष्ट-२] [241 स्साई दोणि तेवढे जोयणसए एक्कवीसं च सद्विभाए जोयणस्स तिरियं तवंति / / --विया. स.८, उ.८, सु. 45 O यहां तिरछे तापक्षेत्र का कथन पूर्व-पश्चिम दिशा की अपेक्षा से कहा गया है, अर्थात् उत्कृष्ट इतनी दूरी पर स्थित सूर्य मानव चक्षु से देखा जा सकता है। उत्तर में 180 योजन न्यून पंतालीस हजार योजन तथा दक्षिण दिशा में द्वीप में 180 योजन और लवणसमुद्र में तेतीस हजार तीन सौ तेतीस योजन तथा एक योजन के तृतीय भाग संयूक्त दूरी से सूर्य देखा जा सकता है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org