________________ 24.] [सूर्यप्रज्ञप्तिसूत्र उ. गोयमा ! नो एगदिसि ओभासेंति, नियमा छद्दिसि ओमासेंति।'—विया. स. 8, उ. 8, सु. 39, 40 जंबुद्दीवे सूरिया पडुप्पन्नं खेत्तं उज्जोति प. जंबुद्दीवे णं भंते ! दीवे सूरिया कि तीयं खेतं उज्जोति, पडुप्पन्नं खेत्तं उज्जोति, अणागयं खेत्तं उज्जोवेंति ? उ. गोयमा ! नो तीये खेत्तं उज्जोवेति, पडुप्पन्नं खेत्तं उज्जोवेंति, नो अणागयं खेत्तं उज्जोवेंति, एवं तवेंति, एवं भासंति जाव नियमा छहिसिं भासंति / / जंबुद्दीवे सूरियाणं ताव खेत्त पमाणं -विया. स. 8, उ. 8, सु. 41-42 प. जंबुद्दोवे गं भंते ! दोवे सूरिया केवइयं खेत्तं उडढं तवंति ? केवइयं खेत्तं अहे तवंति ? केवइयं खेत्तं तिरियं तवंति? उ. गोयमा ! एग जोयणसयं उड्ढं तवंति, अद्वारसजोयणसयाई अहे तवंति, सीयालीसं जोयणसह प. तं भंते ! कि आई प्रोभासें ति, मज्भे प्रोभासेंति, अंते प्रोभासेंति ? उ. गोयमा ! प्राई पि, मझे वि, अंते वि श्रोभासेंति, प. तं भंते ! कि सविसए प्रोभासें ति, अविसए प्रोभासेंति ? उ. गोयमा ! सविसए प्रोभासेंति, नो अविसए प्रोभासें ति, प. तं भंते ! कि प्राणब्धि प्रोभासेंति, अणाणधि प्रोभासेंति ? उ. गोयमा ! प्राणपूवि प्रोभासेंति, नो अणाणपब्बि प्रोभासेंति, प. तं भंते ! कइ दिसि प्रोभासेंति ? उ. गोयमा ! नियमा छहिसि प्रोभासें ति, -विया. स. 8, उ.८, सु.३९ टिप्पण [प. त भंते ! कि एगदिसि प्रोभासेंति, छहिसि प्रोभासेंति ? उ. गोयमा ! नो एगदिसि प्रोभासें ति, नियमा छद्दिसि प्रोभाति / / (पाठान्तर) 1. जंबु. वक्ख. 7, सु, 137 2. जंबु वक्ख. 7, सु. 137 3. (क) जंबु. वक्ख. 7, सु. 139 (ख) सूरिय. पा. 4, सु. 25 सूर्य के विमान से सौ योजन ऊपर शनैश्चर ग्रह का विमान है और वहीं तक ज्योतिष चक्र की सीमा है, अत: इससे ऊपर सूर्य का तापक्षेत्र नहीं हैं। जंबूद्वीप के पश्चिम महाविदेह से जयंतद्वार की ओर लवणसमुद्र के समीप क्रमश: एक हजार योजन पर्यन्त भूमि नीचे है, इस अपेक्षा से एक हजार योजन तथा मेरु के समीप की समभूमि से 800 योजन ऊँचा सूर्य का विमान है, ये आठ सौ योजन संयुक्त करने पर अठारह सौ योजन सूर्य विमान से नीचे की ओर का तापक्षेत्र है, अन्य द्वीपों में भूमि सम रहती है। इसलिए वहाँ सर्य का नीचे का तापक्षेत्र केवल पाठ सौ योजन का है। अठारह सौ योजन नीचे की ओर के तापक्षेत्र के और सौ योजन ऊपर की ओर के तापक्षेत्र के, इन दोनों संख्याओं के संयुक्त करने पर 1900 योजन का सर्य का तापक्षेत्र है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org