________________ 216] सूर्यप्रज्ञप्तिसूत्र / (मायाम)' x 10 ) (100660)24 10 ) 10132435600 4 10 318314. 869 योजन परिक्षेप ) / / / / / / 101324356000 113 61 628 5224 5024 6363 020035 19089 0094660 636624 3099900 2546496 6366288 055340400 50930304 63662966 0441009600 381975796 636629729 5903380400 5629667561 इस प्रकार 869 हजार से कम हैं, परन्तु 'अर्धादूर्ध्वमेकं ग्राह्यम्' इस न्याय से 314 के स्थान पर 315 ग्रहण किये हैं। इस प्रकार सर्वबाह्यमंडल का परिक्षेप 318315 योजन (व्यवहार से) होता है। सर्वाभ्यंतरमंडल का परिक्षेप 315089 योजन है / पूर्व में बताई गई रीति से प्रत्येक मंडल के परिक्षेप में 17 योजन 38161 भाग की वृद्धि होती है तो 183 मंडल में कितने योजन परिक्षेप की वृद्धि होती है ? Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org