________________ [209 सूर्य चन्द्रसूत्र] इय एस पागडत्था, अभश्वजहियय-दुल्लभा इणमो। उक्कित्तिया भगवती जोइसरायस्स पण्णत्ती // 1 // एस गहियावि संती, थद्धे गारवियमाणपडिणीए। अबहुस्सुए ण देया, तबिवरीए भवे या // 2 // (सद्धा) घिइउट्ठाणुच्छाह-कम्मबलविरिय-पुरिसकारेहिं / जो सिक्खियोवि संतो, अभायणे पविखविज्जाहि // 3 // सो पवयण-कुल-गण-संघबाहिरो णाणविणय-परिहीणो। अरहंत-थेरगणहरमेरं किर होइ बोलीणो॥ 4 // तम्हा घिउट्ठाणुच्छाह-कम्मबलवीरियसिक्खियं नाणं / धारेयव्वं णियमा, ण य अविणएसु दायब्वं // 5 // वीरवरस्स भगवतो, जरमरण-किलेस-दोसरहियस्स / वंदामि विणयपणतो सोक्खुप्पाए सया पाए // 6 // सूत्र 107 // वीसइमं पाहुडं समत्तं // चंदपन्नत्ती समत्ता // Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org