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________________ 192] [सूर्यप्रज्ञप्तिसूत्र रिक्खग्गह-तारगग्गं, वीव-समुद्दे जहिच्छसी गाउं / तस्ससोहि तग्गुणियं, रिक्ख-गह-तारग्गं तु // बहिया उ माणुसणगस्स चंद-सूराणऽवट्ठिया जोण्हा / चंदा अभिईजुत्ता, सूरा पुण हुंति पुस्सेहि // इसियागं अंतरं-- गाहाओचंदाओ सूरस्स य, सूरा चंदस्स अंतरं होई / पण्णाससहस्साइं तु जोयणाणं अणूणाई॥ सूरस्स य सूरस्स य, ससिणो ससिणो य अंतरं होई / बाहिं तु माणुसनगस्स जोयणाणं सयसहस्सं / सूरतरिया चंदा, चंदंतरिया य दिणयरा दित्ता। चित्तंतरलेसागा, सहलेसा मंदलेसा य॥ माणुसनगस्स बहिया एगससीपरिवारो गाहाओअट्ठासीइं च गहा, अट्ठावीसं च हुंति णक्खत्ता णं / एगससी परिवारो, एत्तो ताराण वोच्छामि / छाबटि सहस्साई, णव चेव सयाइपंचसयराई। एगससी परिवारो, तारागण कोडिकोडीणं / / अंतोमणुस्सखेत्ते जोइसियाणं उड्ढोववण्णगाइपरूवणं प. अंतो भणुस्सखेत्ते जे चंदिम-सूरिया गह-णक्खत्त-तारारूवा ते णं देवा किं उड्डोव वण्णगा, कप्पोक्वण्णगा, विमाणोववष्णगा, चारोववण्णगा, चारदितिया, गतिरतिया गतिसमावण्णगा? उ. ता ते णं देवा नो उट्टोववण्णगा नो कप्पोववण्णगा, विमाणोववण्णगा, चारोव वण्णगा नो चारदिईया गइरइया गइसमावण्णा / उड्ढामुह-कलंबुअघुप्फसंठाणसंठिएहिं जोयणसाहस्सिएहिं तावक्खेत्तेहिं साहस्सिएहि बाहिराहि य बेउम्वियाहिं परिसाहिं महयाहयणगीयवाइय-तंती-तल-ताल-तुडिय Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003484
Book TitleAgam 16 17 Suryaprajnapti Chandraprajnapti Sutra - Swe Mu Pu Agam 16 17
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages300
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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