________________ 190] [सूर्यप्रजाप्तिसूत्र छाढेि पिडगाई णक्खत्ताणं तु मणुयलोगंमि / छप्पणं णक्खत्ता हुंति एक्केक्कए पिडए / जोइसियाणं पंतीओ गाहाओचत्तारि य पंतीओ, चंदाइच्चाण मणुयलोगमि / छावट्ठि छावट्टि च, हवइ एक्केक्किया पती॥ छावत्तरं गहाणं. पंतिसयं हवंति मणुयलोमि / छावट्टि छाटुिं च हवइ एक्केक्किया पंती // छप्पन्न पंतीओ, णक्खताणं तु भणयलोगमि / छाद्धि छावद्धि हवइ एक्केक्किया पती॥ जोइसियाणं मंडला--- गाहाओते मेरुमणुचरंता, पदाहिणावत्त: मंडला सव्वे / अणवट्ठिय जोगेहि, चंदा सूरा गहगणा य // णक्खत्त-तारगाणं, अवट्ठिया, मंडला मुणयन्वा / तेऽवि य पदाहिणावत्तमेव मेरु अणुचरंति // जोइसियाणं मंडलसंकमणं रणिकर-दिणकराणं, उद्धं च अहेव संकमो नस्थि / मंडलसंकमणं पुण, सम्भंतर-बाहिरं तिरिए / जोइसाणं चारं सुह-दुहस्स निमित्तकारणं रयणिकर-दिणकराणं, मक्खत्ताणं महग्गहाणं च / चारविसेसेण भवे, सुह-दुक्खविही मणुस्साणं / / जोइसाणं तावक्खेत्तं तेसि पविसंताणं तावक्खेत्तं तु वड्डए णिययं / तेणेव कमेण पुणो, परिहायइ निक्खमाणाणं / / तेसि कलंबुयापुप्फसंठिया हंति तावक्खेत्तपहा / अंतो य संकुडा बाहिं वित्थडा चंद-सूराणं // Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org