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________________ पन्द्रहवां प्राभत] [159 35. ता एगमेगेणं मुहुत्तेणं णक्खत्ते केवइयाई भागसयाई गच्छइ ? उ. ताजं जं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरइ, तस्स तस्स मंडल-परिक्खेवस्स अट्ठारस पणतीसे भागसए गच्छइ, मंडलं सयसहस्से णं प्राणउईसएहि छेत्ता छेत्ता।' चंद-सूर-णक्खत्ताणं विसेसगइपरूवणं८४. 15. ता जया णं चंदं गइसमावणं सूरे गइसमावण्णे भवइ, से गं गइमायाए केवइयं विसेसेइ ? उ. बाट्ठिभागे विसेसे इ / 2 प. ता जया णं चंदं गइसमावणं, णक्खत्ते गइसमावण्णे भवइ, से णं गइमायाए केवडयं विसेसेइ ? उ. ता सट्टि भागे विसेसेइ / 3 प. ता जया ण सूरं गइसमावण्णं णखत्ते गइसमावण्णे भवइ, से णं गइमायाए केवइयं बिसेसेइ ? उ. ता पंच भागे विसेसेइ / चंदस्स-णक्खत्ताण य जोगगइपरूवणं ता जया ण चंदे गइसमावष्णं अभिई णक्खते ण गइसमावण्णे पुरथिमाए भागाए समासाएइ समासाइत्ता णवमुहुत्ते सत्तावीसं च सत्तसट्ठिभागे मुहुत्तस्स चंदेण सद्धि जोगं जोएइ, जोगं जोएत्ता जोगं अणुपरियट्टइ, जोगं अणुपरियट्टित्ता, जोगं विप्पजहइ विगयजोगो यावि भवइ, ता जया णं चंदं गइसमावण्णं सवणे णक्खसे गइसमावण्णे पुरथिमाए भागाए समासाएइ, समासाइत्ता तीसं मुहुत्ते चंदेण सद्धि जोगं जोएइ, जोगं जोएत्ता जोगं अणुपरियट्टइ जोगं अणुपरिट्टित्ता जोगं विप्पजहइ विगयजोगी यावि भवइ। एवं एएणं अभिलावेणं णेयध्वं, पण्णरसमुहुत्ताई, तीसइमुहुत्ताई पणयालीसमुहत्ताई। भाणियव्वाइं जाव उत्तरासाढा, चंदस्स गहाण य जोग-गइकालपरूवणं--- 84. ता जया णं चंदं गइसमावणं गहे गइसमावण्णे पुरस्थिमाए भागाए समासाएइ, पुरथिमाए भागाए समासाइत्ता चंदेण सद्धि जोगं जोएइ, जोगं जोएत्ता जोगं अणुपरियट्टइ, जोगं अणुपरियट्टित्ता जोगं विप्पजहइ, विगयजोगी यावि भवइ / 'ताराओं की गति सबसे अधिक है। ऐसा मुल पाठ में कथन है किन्तु गति के प्रमाण का कथन नहीं है, टीकाकार ने भी इस मम्बन्ध में कुछ नहीं कहा है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003484
Book TitleAgam 16 17 Suryaprajnapti Chandraprajnapti Sutra - Swe Mu Pu Agam 16 17
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages300
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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