________________ नवम प्राभूत [71 __ता सूरियस्स णं सव्वहिटिमाओ सूरप्पडिहीओ बहिता अभिणिसट्टाहि लेसाहिं ताडिज्जमागोहिं इमोसे रयणप्पभाए पुढवीए बहुसमरमणिज्जाओ भूमिभागाओ जावइयं सूरिए उड्ढे उच्चत्तेणं, एवइयाई छण्णउईए छायाणुमाणप्पमाहि उमाए, एस्थ णं से सूरिए छण्ण उई पोरिसीयं छायं निव्वत्तेइ ति, वयं पुण एवं वयामो ता साइरेग-अउणट्ठि-पोरिसीणं सूरिए पोरिसिच्छायं निव्वत्तेइ ति / पोरिसिच्छाय-प्पमाणं 5. ता अवद्ध-पोरिसी णं छाया दिवसस्स कि गए वा सेसे वा? उ. ता ति-भागे गए वा सेसे वा। प. ता अउणसद्धिपोरिसी गं छाया दिवसस्स कि गए वा सेसे वा ? उ. ता बावीससहस्सभागे गए वा सेसे वा / प. ता पोरिसी णं छाया दिवसस्स किं गए वा सेसे वा? उ. ता चउभागे गए वा सेसे वा,' प. ता दिवड्ढ-पोरिसी गं छाया दिवसस्स किं गए वा सेसे वा ? उ. ता पंचभागे गए वा, सेसे वा। प. ता बि-पोरिसी णं छाया दिवसस्स कि गए वा सेसे वा? उ. ता छन्भागगए वा, सेसे वा। प. ता अड्ढाइज्ज-पोरिसी णं छाया दिवसस्स कि गए वा सेसे वा ? उ. ता सत्तभागगए वा, सेसे वा। एवं अवठ्ठपोरिसिं छोढ़ छोढुपुच्छा ,' दिवसभागं छोढुं छोदुवागरणं जाव.... 1. पौरुषी की परिभाषा--- "पुरिस ति, संकु, पूरिस-सरीरं वा, ततो पूरिसे निप्फन्ना पारिसी, एवं सव्वस्स वत्थुणो यदा स्वप्रमाणा छाया भवति, तदा हवइ, एवं पोरिसि-प्रमाणं उत्तरायणस्स अंते, दक्षिणायणस्स आईए इक्कं दिणं भवइ, अतो पर अद्ध एगसट्ठिभागा अंगुलस्स दक्खिणायणे वड्ढंति, उत्तरायणे हस्संति, एवं मंडले मंडले अन्ना पोरिसो" 'यह पौरुषी की परिभाषा सूर्य-प्रज्ञप्ति की टीका में नन्दिणि से उद्धत है।' चणि की भाषा संस्कृत-मिश्रित प्राकृत होती है, अतः ऊपर अंकित चूर्णि-पाठ अशुद्ध नहीं है। 2. एवमित्यादि-एवमुक्तेन प्रकारेण 'अर्द्धपौरुषो' अर्द्धपुरुषप्रमाणां छाया क्षिप्त्वा, क्षिप्त्वा पच्छा पच्छासूत्र द्रष्टव्यं / -सूर्य. टीका. 3. "दिवसभागं" ति, पूर्व-पूर्वसूत्रापेक्षया एकैकमधिकं दिवसभामं क्षिप्त्वा क्षिप्त्वा व्याकरण, उत्तरसूत्र ज्ञातव्यम् / ---सूर्य. टीका Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org