________________ नवम प्राभूत] तत्थ जे ते एबमाहंसु(क) 1. ता अत्थि णं से दिवसे जंसि णं दिवसंसि सूरिए चउ-पोरिसिच्छायं निव्वत्तेइ, (ख) अस्थि णं से दिवसे जंसि णं दिवसंसि सूरिए दु-पोरिसिच्छायं निव्वत्तेइ, ते एवमासु, (क) ता जया णं सूरिए सव्वभंतरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरइ, तया णं उत्तमकट्टपत्ते उक्कोसिए अट्ठारसमुहुत्ते दिवसे भवइ, जहणिया दुवालस-मुहत्ता राई भवइ / तंसि च णं दिवसंसि सूरिए चउ-पोरिसिच्छायं निव्वत्तेइ, तं जहा-उग्गमण-मुहत्तंसि य, अत्थमण-मुहुत्तसि य, लेसं अभिवड्ढेमाणे नो चेव णं निव्वुड्ढेमाणे / [ख] ता जया णं सूरिए सव्वबाहिरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरइ, तया णं उत्तमकट्ठपत्ता उक्कोसिया अट्ठारसमुहत्ता राई भवइ, जहण्णए दुवालस-मुहुत्ते दिवसे भवइ, तंसि च णं दिवसंसि सूरिए दु-पोरिसिच्छायं निव्वत्तेइ, तं जहा-उग्गमण-मुहुत्तंसि य, अस्थमणमुहुतंसि य, लेसं अभिवड्ढेमाणे नो चेव णं निव्वुड्ढेमाणे / तत्थ णं जे ते एवमाहंस२. ता अस्थि णं से दिवसे जंसि णं दिवसंसि सूरिए दु-पोरिसिच्छायं निव्वत्तेइ, अस्थि णं से दिवसे जंसि णं दिवसंसि सूरिए नो किचि पोरिसिच्छायं निध्वत्तेइ, ते एवमाहंसु, [क] ता जया णं सूरिए सम्वन्भंतरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरइ, तया णं उत्तमकट्ठपत्ते उक्कोसिए अट्ठारस-मुहत्ते दिवसे भवइ, जहणिया दुवालस-मुहत्ता राई भवइ, तंसि च णं दिवसंसि सूरिए दु-पोरिसिच्छायं निव्वत्तेइ, तं जहा~-उग्गमण-मुहुत्तंसि य, अस्थमण-मुहत्तंसि य, लेसं अभिवड्ढेमाणे, नो चेव गं निन्वुड्ढेमाणे, [ख] ता जया णं सूरिए सवबाहिरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरइ, तया गं उत्तमकट्टपत्ता उक्कोसिया अट्ठारस-मुहत्ता राई भवइ, जहण्णए दुवालस-मुहुत्ते दिवसे भवइ, तंसि च णं दिवसंसि सूरिए नो किचि पोरिसिच्छायं निव्वत्तेइ, तं जहा-उग्गमण-मुहुरासि य, अस्थमण-मुहत्तंसि य, ___नो चेव णं लेसं अभिवड्ढेमाणे वा, निव्वुड्ढेमाणे वा / ' 1. इसके अनन्तर यहाँ स्वमतसूचक 'वयं पुण एवं व्यामो' यह वाक्य नहीं है और न स्वमत का कथन ही है। 'तदेव परतीथिक-प्रतिपत्तिद्वयं श्रुत्वा भगवान गौतमः स्वमतं पृच्छति, ता कइ कट्ठमित्यादि' -सूर्य. टीका टीकाकार का यह कथन सूर्य प्रज्ञप्ति की संकलनशैली के अनुरूप नहीं है क्योंकि प्रतिपत्तियों के कथन के अनन्तर 'वयं पुण एवं वयामो' इस वाक्य से हो सर्वत्र स्वमत का प्रतिपादन किया गया है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org