________________ 68] [सूर्यप्रज्ञप्तिसूत्र तत्थेगे एवमाहंसु१. ता अणुसमयमेव सूरिए पोरिसिच्छायं णिव्वत्तेइ, आहिए ति वएज्जा, एगे एक्माहंसु, एगे पुण एवमाहंसु२. ता अणुमुहुत्तमेव सूरिए पोरिसिच्छायं णिवत्तेइ, आहिए त्ति वएज्जा, जाओ चेव ओयसंठिईए पडिवत्तीओ एएणं अभिलावणं णेयवाओ, जाव' [3.24] एगे पुण एवमाहंसु 25. ता अणुउस्स प्पिणि-प्रोसप्पिणिमेव सूरिए पोरिसिच्छायं णिवत्तेइ आहिए त्ति वएज्जा, एगे एवमाहंसु, वयं पुण एवं वयामो:ता सूरियस्स णं१. उच्चत्तं च लेसं च पडुच्च छायुद्देसे, 2. उच्चत्तं च छायं च पडुच्च लेसुद्देसे, 3. लेस्सं च छायं च पडुच्च उच्चत्तोद्देसे प.....................२ उ. तत्थ खलु इमाओ दुवे पडिवत्तीओ पण्णत्ताओ, तंजहा-- तत्थेगे एवमाहंसु(क) 1. ता अत्यि णं से दिवसे जंसि गं दिवसंसि सूरिए चउपोरिसिच्छायं निव्वत्तेइ, (ख) अस्थि णं से दिवसे जंसि णं दिवसंसि सूरिए दु-पोरिसिच्छायं निव्वत्तेइ, एगे एवमाहंसु एगे पुण एवमाहंसु(क) 2. ता अस्थि णं से दिवसे जंसि णं दिवसंसि सूरिए दु-पोरिसिच्छायं निव्वत्तेइ, (ख) अस्थि णं से दिवसे जंसि णं दिवसंसि सूरिए नो किचि पोरिसिच्छायं निव्वत्तेइ, 1. सूरिए. पा. 6. सु. 27 2. सूर्यप्रज्ञप्ति की संकलनशैली के अनुसार यहां प्रश्नसूत्र होना चाहिए था, किन्तु यहां प्रश्नसूत्र प्रा. स. यादि किसो प्रति में नहीं है, अत: यहां का प्रश्नसूत्र विच्छिन्न हो गया है, ऐसा मान लेना ही उचित है। सूर्यप्रज्ञप्ति के टीकाकार भी यहां प्रश्न-सूत्र के होने न होने के सम्बन्ध में सर्वथा मौन है, अत: यहां प्रश्न-नूत्र का स्थान रिक्त रखा है। यदि कहीं किसी प्रति में प्रश्न-सूत्र हो तो स्वाध्यायशील प्रागमज्ञ सूचित करने की कृपा करें, जिससे द्वितीय संस्करण में परिवर्धन किया जा सके / Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org