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________________ [सूर्यप्राप्तिसूत्र गिम्ह उउ (क) ता जया णं जंबुद्दोवे दोवे मंदरस्स पब्वयस्स दाहिणड्ढे गिम्हाणं पढमे समए पडिवज्जइ, तया णं उत्तरढेऽवि गिम्हाणं पढमे समए पडिवज्जइ। जया णं उत्तर गिम्हाणं पढमे समए पडिवज्जइ, तया णं जंबद्दीवे दीवे मंदरस्स पव्वयस्स पुरस्थिम-पच्चस्थिमे णं अणंतर-पुरक्खड-काल-समयंसि गिम्हाणं पढमे समए पडिवज्जइ / (ख) ता जया णं जंबुद्दीवे दीवे मंदरस्स पन्धयस्स पुरथिमे णं गिम्हाणं पढमे समए पडिवज्जइ, तया णं पच्चस्थिमेऽवि गिम्हाणं पढमे समए पडिवज्जइ, जया पच्चस्थिमे णं गिम्हाणं पढमे समए पडिवज्जइ, तया णं जंबुद्दीवे दीवे मंदरस्स पव्ययस्स उत्तर-वाहिणे णं अणंतर-पच्छाकड काल-समयंसि गिम्हाणं पढमे समए' पडिवज्जइ / जहा समओ तहा 1. आवलिया, 2. आणापाण, 3. थोवे, 4. लवे, 5. मुहुत्ते, 6. अहोरत्ते, 7. पक्खे, 8. मासे, एए अट्ठ आलावगा, जहा गिम्हाणं तहा भाणियन्वा / अयणाइ (क) ता जया णं जंबुद्दीवे दौवे मंदरस्स पव्वयस्स दाहिणड्ढे पढमे अयणे पडिवज्जइ, तया णं उत्तरड्ढेऽवि पढमे अयणे पडिवज्जइ / जया णं उत्तरड्ढे पढमे अयणे पडिवज्जइ, तया णं दाहिणड्ढेऽवि पढमे अयणे पडिवज्जइ / जया णं उत्तरड्ढे पढमे अयणे पडिवज्जइ, तया गं जंबुद्दीवे दीवे मंदरस्स पन्वयस्स पुरस्थिमपच्चस्थिमे णं अणंतर-पुरक्खड-काल-समयंसि पढमे अयणे पडिवज्जइ / (ख) ता जया णं जंबुद्दीवे दोवे मंदरस्स फव्वयस्स पुरथिमे गं पढमे अयणे पडिवज्जइ, तया णं पच्चत्थिमेऽवि पढमे अयणे पडियज्जइ। जया णं पच्चस्थिमे णं पढमे अयणे पडिवज्जइ, तया णं पुरत्थिमेऽवि पढमे अयणे पडिवज्जइ / जया णं पञ्चस्थिमे णं पढमे अयणे पडिवज्जइ, तया णं जंबुद्दीवे दीवे मंदरस्स पव्वयस्स उत्तरदाहिणे णं अणंतर-पच्छाकड-काल-समयंसि पढमे अयणे पडिवज्जइ / जहा पढमस्स अयणस्स आलावगो तहा दोच्चस्स अयणस्स भाणियन्यो। जहा अयणे तहा संवच्छरे, जुगे, वाससए, वाससहस्से, वास-सयसहस्से, पुन्वगे, पुठवे, जाव सीसपहेलिया पलिओवमे सागरोवमे य / ऊपर सूत्र में "पढमे समए" आठ स्थानों पर है, उन स्थानों पर नीचे लिखे पालापक कहें और प्रत्येक पालापक के ऊपर के समान दो दो सुत्र कहें। 1. पढमा प्रावलिया, 2. पढमो प्राणापाण, 3. पढमे थोवे, 4. पढमे लवे, 5. पढमे मुहत्ते, 6. पढमे अहोरते, 7. पढमे पक्खे, 8. पढमे मासे। 2. जहाँ जहाँ "पढमे अयणे" है, वहां वहां "दीच्चे प्रयणे" कहें। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003484
Book TitleAgam 16 17 Suryaprajnapti Chandraprajnapti Sutra - Swe Mu Pu Agam 16 17
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages300
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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