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________________ 404] [प्रज्ञापनासूत्र से केण?णं भंते ! एवं वुच्चति ? गोयमा ! जहा रयणप्पभापुढविणेरइयस्स तित्थगरत्ते (सु. 1444) / [1456 प्र.] भगवन् ! रत्नप्रभापृथ्वी का नैरयिक (अपने भव से) उद्वर्तन करके क्या चक्रवर्तीपद प्राप्त कर सकता है ? [उ.] गौतम ! (इनमें से कोई (नारक) चक्रवर्तीपद प्राप्त करता है, कोई नहीं करता। [प्र.] भगवन् ! किस कारण से ऐसा कहा जाता है कि कोई (रत्नप्रभापृथ्वी का नारक) चक्रवत्तित्व प्राप्त करता है और कोई नहीं प्राप्त करता? उ.] गौतम ! जैसे (सू. 1444 में) रत्नप्रभापृथ्वी के नारक को तीर्थकरत्व (प्राप्त होने, न होने के कारणों का कथन किया है, उसी प्रकार उसके चक्रवर्तीपद प्राप्त होने, न होने का कथन समझना चाहिए।) 1460. सक्करप्पभापुढविणेरइए अणंतरं उव्वट्टित्ता चक्कट्टित्तं लभेज्जा ? गोयमा ! णो इण8 सम? / [1460 प्र.] (भगवन् ! ) शर्कराप्रभापृथ्वी का नारक (अपने भव से) उद्वर्तन करके सीधा चक्रवर्तीपद पा सकता है ? [उ.] गौतम ! यह अर्थ (बात) समर्थ (शक्य) नहीं है / 1461. एवं जाव अहेसत्तमापुढविणेरइए। [1461] इसी प्रकार (वालुकाप्रभापृथ्वी के नारक से ले कर) यावत् अधःसप्तमपृथ्वी के नारक तक (के विषय में समझ लेना चाहिए / ) 1462. तिरिय-मणुएहितो पुच्छा। गोयमा ! जो इण? सम? / [1462 प्र.] (तिर्यञ्चयोनिक और मनुष्यों के विषय में) पृच्छा है (कि ये) तिर्यञ्चयोनिकों और मनुष्यों से (निकल कर सीधे क्या चक्रवर्तीपद प्राप्त कर सकते हैं ?) [उ.] गौतम ! यह अर्थ समर्थ नहीं है। 1463. भवणवइ-वाणमंतर-जोइसिय-वेमाणिएहितो पुच्छा। गोयमा ! प्रत्थेगइए लभेज्जा, अत्थेगइए नो लभेज्जा / दारं 6 // [1463 प्र.] (इसी प्रकार) भवनपति, वाणव्यन्तर, ज्योतिष्क और वैमानिक देव के सम्बन्ध में प्रश्न है कि (क्या वे अपने-अपने भवों से च्यवन कर सीधे चक्रवर्तीपद पा सकते हैं ?) [उ.] गौतम ! (इनमें से) कोई चक्रवर्ती-पद प्राप्त कर सकता है (और) कोई नहीं प्राप्त कर सकता। -छठा द्वार // 6 // विवेचन–चक्रवर्तीपद-प्राप्ति की विचारणा- प्रस्तुत सप्तम द्वार में चक्रवर्तीपद किसको प्राप्त होता है, किसको नहीं ? इस विषय में विचारणा की गई है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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