________________ सोलहवाँ प्रयोगपद : प्राथमिक] [209 * इसमें से प्रथम प्रयोगगति तो वही है, जिसके 15 प्रकारों की चर्चा पहले की गई है / ततगति मंजिल पर पहुँचने से पहले की सारी विस्तीर्ण गति को कहा गया है, फिर जीव और शरीर का बन्धन छूटने से होने वाली बन्धनछेदनगति, फिर नारकादि चार भवोपपातगति, क्षेत्रोपपात गति और नोभवोपपात (पुद्गलों और सिद्धों की) गति का वर्णन है। अन्त में 17 प्रकार की आकाश-अवकाश से सम्बन्धित विहायोगति का वर्णन है। इन भेदों के वर्णन पर से गति की नाना प्रकार की विशेषताएं स्पष्ट प्रतीत होती हैं।' CO (क) पण्णवणासुत्तं भा. 2, प्रस्तावना पृ. 101 से 103, (ख) पण्णवणासुत्त (मूलपाठ) भा. 1, पृ. 261 से 273 तक (ग) प्रजापना. मलय. वृत्ति, पत्रांक 319 से 330 तक ! Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org