________________ [ प्रज्ञापनासूत्र गोयमा ! प्रसंखेज्जा। केवतिया पुरेक्खडा? गोयमा ! प्रणंता। [1048-1 प्र.] भगवन् ! (बहुत-से) नैरयिकों की नारकत्वरूप में अतीत द्रव्येन्द्रियाँ कितनी हैं ? [1048.1 उ.] गौतम ! (बे) अनन्त हैं। [प्र.] (उनकी) बद्ध (द्रव्येन्द्रियाँ) कितनी हैं ? [उ.] गौतम ! (वे) असंख्यात हैं। [प्र.] (उनकी) पुरस्कृत (द्रव्येन्द्रियाँ) कितनी हैं ? [उ.] गौतम ! (वे) अनन्त हैं। [2] रइयाणं भंते ! असुरकुमारत्ते केवतिया विदिया प्रतीता ? गोयमा ! अणंता। केवतिया बदल्लगा? गोयमा ! णस्थि / केवतिया पुरेक्खडा? गोयमा ! अणंता। [1048-2 प्र.] भगवन् ! (बहुत-से) नैरयिकों की असुरकुमारत्वरूप में (अतीत द्रव्येन्द्रियाँ कितनी हैं ? [1048-2 उ.] गौतम ! (वे) अनन्त हैं / [प्र. (उनकी) बद्ध (द्रव्येन्द्रियाँ) कितनी हैं ? [उ.] गौतम ! नहीं हैं। [प्र.] (उनकी) पुरस्कृत (द्रव्येन्द्रियाँ) कितनी हैं ? [उ.] गौतम ! अनन्त हैं। [3] एवं जाव गेवेज्जगदेवत्त / [1048.3] (बहुत-से नारकों की) नागकुमारत्व से लेकर यावत् अवेयकदेवत्वरूप में (अतीत बद्ध पुरस्कृत द्रव्येन्द्रियों की वक्तव्यता भी इसी प्रकार (पूर्ववत्) जाननी चाहिए। [4] रइयाणं भंते ! विजय-जयंत-जयंत-अपराजियदेवत्ते केवतिया दविदिया प्रतीता? णस्थि / केवतिया बद्धलगा? त्थि / केवतिया पुरेक्खडा ? असंखेज्जा / Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org