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________________ 42] [प्रज्ञापनासूत्र पर्याप्तक और अपर्याप्तक का स्वरूप समझ लेना चाहिए।' __श्लक्ष्ण बादरपृथ्वीकायिक-पीसे हुए आटे के समान मृदु (मुलायम) पृथ्वी श्लक्ष्ण कहलाती है / इलक्षण प्रथिव्यात्मक जीव भी उपचार से इलक्ष्ण कहलाते हैं। जिन बादरपथ्वी के जीवों का शरीर श्लक्ष्ण-मृदु है, वे श्लक्ष्ण बादरपृथ्वीकायिक हैं। यह मुख्यतया सात प्रकार की होती है। उनमें से पाण्डुमत्तिका का अर्थ यह भी है कि किसी देश में मिट्री धुलिरूप में हो कर भी 'पाण्ड' नाम से प्रसिद्ध है / पनकमृत्तिका का अर्थ वृत्तिकार ने इस प्रकार किया है नदी आदि में बाढ़ से डूबे हुए प्रदेश में नदी आदि के पूर के चले जाने के बाद भूमि पर जो श्लक्ष्णमृदुरूप पंक शेष रह जाता है, जिसे 'जलमल' भी कहते हैं, वही पनकमृत्तिका है / 2 / खर बादरपथ्वीकायिकों की व्याख्या-प्रस्तुत गाथाओं में खर बादरपृथ्वीकायिकों के 40 भेद बताए हैं / अन्त में यह भी कहा है कि ये और इसी प्रकार के अन्य जो भी पद्मरागादि रत्न हैं, वे सब इसी के अन्तर्गत समझने चाहिए / अपर्याप्तकों का स्वरूप --खर बादरपृथ्वीकायिक के पर्याप्तक और अपर्याप्तक जो दो भेद हैं, उनमें से अपर्याप्तक या तो अपनी पर्याप्तियों को पूर्णतया असंप्राप्त हैं अथवा उन्हें विशिष्ट वर्ण आदि प्राप्त नहीं हुए हैं। इस दृष्टि से उनके लिए यह नहीं कहा जा सकता कि वे कृष्ण आदि वर्ण वाले हैं। शरीर आदि पर्याप्तियां पूर्ण हो जाने पर ही बादर जीवों में वर्ण आदि विभाग प्रकट होता है, अपूर्ण होने की स्थिति में नहीं। तथा वे अपर्याप्तक उच्छवास पर्याप्ति से अपर्याप्त रह कर ही मर जाते हैं, इसी कारण उनमें स्पष्टतर वर्णादि का विभाग सम्भव नहीं / इसी दृष्टि से उन्हें 'असम्प्राप्त' कहा है / पर्याप्तकों के वर्णादि के भेद से हजारों भेद-- इनमें से जो पर्याप्तक हैं, जिनकी अपने योग्य चार पर्याप्तियां पूर्ण हो चुकी हैं, उनके वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श के भेद से हजारों भेद होते हैं। जैसे-वर्ण के 5, गन्ध के 2, रस के 5 और स्पर्श के 8 भेद होते हैं / फिर प्रत्येक वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श में अनेक प्रकार की तरतमता होती है / जैसे-भ्रमर, कोयल और कज्जल आदि में कालेपन की न्यूनाधिकता होती है / अत: कृष्ण, कृष्णतर और कृष्णतम आदि अनेक कृष्णवर्णीय भेद हो गए। इसी प्रकार नील आदि वर्ण के विषय में समझना चाहिए। गन्ध, रस और स्पर्श से सम्बन्धित भी ऐसे ही अनेक भेद होते हैं / इसी प्रकार वर्गों के परस्पर मिश्रण से धूसरवर्ण, कर्बु र (चितकबरा) वर्ण आदि अगणित वर्ण निष्पन्न हो जाते हैं / इसी प्रकार एक गन्ध में दूसरी गन्ध के मिलने से, एक रस में दूसरा रस मिश्रण करने से, एक स्पर्श के साथ दूसरे स्पर्श के संयोग से हजारों भेद गन्ध, रस और स्पर्श की अपेक्षा से हो जाते हैं / ऐसे पृथ्वीकायिकों को लाखों योनियां-उपर्युक्त पृथ्वीकायिक जीवों की लाखों योनियां हैं / यही बात मूलपाठ में कही गई है'संखेज्जाई जोणिप्पमुहसयसहस्साई'-अर्थात् 'संख्यातलाख योनिप्रमुख-योनिद्वार हैं।' जैसे कि एकएक वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श में पृथ्वीकायिकों की संवृता योनि होती है / वह तीन प्रकार की हैसचित्त, अचित्त और मिश्र / इनके प्रत्येक के तीन-तीन भेद होते हैं- शीत, उष्ण और शीतोष्ण / इन शीत आदि प्रत्येक के भी तारतम्य के कारण अनेक भेद हो जाते हैं। यद्यपि इस प्रकार से स्वस्थान में विशिष्ट वर्णादि से युक्त योनियां व्यक्ति के भेद से संख्यातीत हो जाती हैं, तथापि वे सब जाति (सामान्य) को अपेक्षा एक ही योनि में परिगणित होती हैं। इस दृष्टि से पृथ्वीकायिक जीवों की 1. (क) प्रज्ञापनासूत्र मलय. वृत्ति, पत्रांक 25-26 (ख) ग्राहारपर्याप्ति के सम्बन्ध में सूक्ष्मचर्चा देखिये-प्रजापना. 28 वां ग्राहारपद / 2. प्रज्ञापनासूत्र. मलय. वृत्ति, पत्रांक 26 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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