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________________ ग्यारहवाँ भाषापद] (2) सम्मतसत्या, (3) स्थापनासत्या, (4) नामसत्या, (5) रूपसत्या, (6) प्रतीत्यसत्या (7) व्यवहारसत्या, (8) भावसत्या, (9) योगसत्या और (10) प्रौपम्यसत्या। [संग्रहणीगाथार्थ-] (दस प्रकार के सत्य)-(१) जनपदसत्य, (2) सम्मतसत्य, (3) स्थापनासत्य, (4) नामसत्य, (5) रूपसत्य, (6) प्रतीत्यसत्य, (7) व्यवहारसत्य, (8) भावसत्य, (9) योगसत्य और (10) दसवाँ प्रौपम्यसत्य / / / 194 // 863. मोसा णं भंते ! भासा पज्जत्तिया कतिबिहा पण्णता? गोयमा ! दसविहा पण्णत्ता / तं जहा–कोहणिस्सिया 1 माणणिस्सिया 2 मायाणिस्सिया 3 लोमणिस्सिया 4 पेज्जणिस्सिया 5 दोसणिस्सिया 6 हासणिस्सिया 7 भयणिस्सिया 8 अक्खाइयाणिस्सिया / उवघाणिस्सिया 10 / कोहे 1 माणे 2 माया 3 लोभे 4 पेज्जे 5 तहेव दोसे 6 य / हास 7 भए 8 अक्खाइय 6 उवधाइयणिस्सिया 10 दसमा // 16 // [863 प्र.] भगवन् ! मृषा-पर्याप्तिका भाषा कितने प्रकार की कही गई है ? [863 उ.] गौतम ! (वह) दस प्रकार की कही गई है। वह इस प्रकार है-(१) क्रोधनिःसृता, (2) माननिःसृता, (3) मायानिःसृता, (4) लोभनिःसृता, (5) प्रेयनिःसृता (रागनिःसृता), (6) द्वषनिःसृता, (7) हास्यनिःसृता, (8) भयनिःसृता, (9) प्राख्यायिकानि:सृता और (10) उपधातनिःसृता। [संग्रहणीगाथार्थ-] क्रोधनिःसृत, माननिःसृत, मायानिःसृत, लोभनिःसृत, प्रेय (राग)निःसृत, तथा द्वेषनिःसृत, हास्यनिःसृत, भयनिःसृत, आख्यायिकानिःसृत और दसवाँ उपघातनिःसृत असत्य / / / 195 // 864. अपज्जत्तिया णं भंते ! भासा कतिविहा पणत्ता? गोयमा! दुविहा पण्णत्ता / तं जहा-सच्चामोसा य असच्चामोसा य / [864 प्र.] भगवन् ! अपर्याप्तिका भाषा कितने प्रकार की कही गई है ? [864 उ.] गौतम ! (वह) दो प्रकार की कही गई है / वह इस प्रकार–सत्या-मृषा और असत्यामृषा। 865. सच्चामोसा णं भंते ! भासा अपज्जत्तिया कतिविहा पण्णता? गोयमा ! दविहा पण्णत्ता / तं जहा--उप्पण्णमिस्सिया 1 विगयमिस्सिया 2 उप्पण्णविगयमिस्सिया 3 जीवमिस्सिया 4 अजीवमिस्सिया 5 जीवाजीवमिस्सिया 6 प्रणतमिस्सिया 7 परित्तमिस्सिया 8 प्रद्धामिस्सिया 6 प्रद्धद्धामिस्सिया 10 / [865 प्र.] भगवन् ! सत्यामृषा-अपर्याप्तिका भाषा कितने प्रकार की कही गई है ? ___ [865 उ.] गौतम ! (वह) दस प्रकार को कही गई है। वह इस प्रकार है-(१) उत्पन्नमिश्रिता, (2) विगतमिश्रिता, (3) उत्पन्न-विगतमिश्रिता, (4) जीवमिश्रिता, (5) अजीवमिश्रिता, Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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