________________ दसवां चरमपद ] [43 (7) भाव-चरम-अचरम-ग्रौदयिक आदि पांच भावों के अर्थ में यहाँ भाव शब्द है / औदयिक आदि भावों में से कोई भाव जिस जीव के लिए अन्तिम हो, फिर कभी अथवा वर्तमान गति में फिर कभी वह भाव नहीं प्राप्त होगा. तब उस जीव को भावचरम कहा जायेगा, इसके विपरीत भावअचरम है। (8-11) वर्ण-गन्ध-रस-स्पर्श-चरम अचरम-जिस जीव के लिए वर्ण, गन्ध, रस या स्पर्श अन्तिम हो, फिर उसे प्राप्त न हो, वह वर्णादि-चरम है, जिसे पुन: वर्णादि प्राप्त हो रहे हैं, होंगे भी, वह वर्णादि-अचरम है / इन ग्यारह द्वारों के माध्यम से एकवचन और बहुवचन के रूप में नारकों से लेकर वैमानिकों तक के चरम-अचरम विषयक प्रश्नों के उत्तर एक से हैं। एकवचनात्मक नारकादि जीव कथंचित् चरम है, कथंचित् अचरम है, अर्थात कोई नारक आदि चरम होता है, कोई अचरम / इसी प्रकार बहुवचनात्मक नारकादि जीव चरम भी हैं और अचरम भी हैं।' // प्रज्ञापनासत्र : दसवां चरमपद समाप्त // 1. (क) प्रज्ञापना. प्रमेयबोधिनी टीका, भा. 3, पृ. 219 से 231 (ख) प्रज्ञापना. मलय. वृत्ति, पत्रांक 246 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org