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________________ [17 प्रथम प्रज्ञापनापद] स्पर्श-परिणत भी होते हैं, मृदुस्पर्श-परिणत भी, गुरुस्पर्श-परिणत भी, लघुस्पर्श-परिणत भी, शीतस्पर्श-परिणत भी, उष्णस्पर्श-परिणत भी, स्निग्धस्पर्श-परिणत भी और रूक्षस्पर्श-परिणत भी होते हैं। .. (वे) संस्थान से परिमण्डलसंस्थान-परिणत भी होते हैं, वृत्तसंस्थान-परिणत भी, न्यस्र (त्रिकोण) संस्थान-परिणत भी चतुरस्र (चतुष्कोण) संस्थान-परिणत भी और आयतसंस्थान-परिणत भी होते हैं / 20 // [3] जे वण्णनो लोहियवण्णपरिणता ते गंधनो सुब्भिगंधपरिणता वि दुनिभगंधपरिणता वि, रसओ तित्तरसपरिणता वि कडुयरसपरिणता वि कसायरसपरिणता वि अंबिलरसपरिणता वि महररसपरिणता वि, फासो कक्खडफासपरिणता वि मउयफासपरिणता वि गरुयफासपरिणता वि लहुयफासपरिणता वि सीतफासपरिणता वि उसिणफासपरिणता वि निद्धफासपरिणता वि लुक्खफासपरिणता वि, संठाणनो परिमंडलसंठाणपरिणता वि वट्टसंठापरिणता वि तंससंठाणणपरिणता वि चउरंससंठाणपरिणता वि प्रायतसंठाणपरिणता वि 20 / [6-3] जो वर्ण से रक्तवर्ण-परिणत हैं, उनमें से कोई गन्ध से सुगन्धपरिणत होते हैं, कोई दुर्गन्धपरिणत / (वे) रस से तिक्तरस-परिणत भी होते हैं, कटुरस-परिणत भी, कषायरस-परिणत भी, अम्लरस-परिणत भी मधुररस-परिणत भी होते हैं / स्पर्श से (वे) कर्कशस्पर्श-परिणत भी होते हैं, मृदुस्पर्श-परिणत भी, गुरुस्पर्श-परिणत भी, लघुस्पर्श-परिणत भी, शीतस्पर्शपरिणत भी, उष्णस्पर्शपरिणत भी, स्निग्धस्पर्शपरिणत भी होते हैं और रूक्षस्पर्श-परिणत भी। संस्थान से -परिमण्डल संस्थान-परिणत भी होते हैं, वृत्तसंस्थान-परिणत भी, त्यस्रसंस्थान-परिणत भी, चतुरस्त्रसंस्थानपरिणत भी होते हैं और आयतसंस्थान-परिणत भी // 20 // [4] जे वरुणो हालिद्दवण्णपरिणता ते गंधमो सुन्भिगंधपरिणता वि दुनिभगंधपरिणता वि, रसपो तित्तरसपरिणता वि कडुयरसपरिणता वि कसायरसपरिणता वि अंबिलरसपरिणता वि महुररसपरिणता वि, फासो कक्खडफासपरिणता वि मउयफासपरिणता वि गरुयफासपरिणता वि लहुयफासपरिणता वि सीतफासपरिणता वि उसिणफासपरिणता वि निद्धफासपरिणता वि लुक्खफासपरिणता वि, संठाणम्रो परिमंडलसंठाणपरिणता वि वसंठाणपरिणता वि तंससंठाणपरिणता वि चउरंससंठाणपरिणता वि पायतसंठाणपरिणता वि 20 / [9-4] जो वर्ण से हारिद्र (पीत) वर्ण-परिणत होते हैं, उनमें से कोई गन्ध से सुगन्ध-परिणत भी होते हैं, कोई दुर्गन्ध-परिणत भी हो सकते हैं। रस से कोई तिक्तरस-परिणत होते हैं, कोई कटुरस-परिणत भी, कोई कषायरस-परिणत भी, कोई अम्लरस-परिणत और मधुररसपरिणत भी होते हैं। स्पर्श से उनमें से कोई कर्कशस्पर्श-परिणत होते हैं, कोई मृदुस्पर्श-परिणत एवं गुरुस्पर्शपरिणत भी, लघुस्पर्श-परिणत भी, शीतस्पर्श-परिणत भी, उष्णस्पर्शपरिणत भी, स्निग्धस्पर्श-परिणत भी होते हैं और रूक्षस्पर्श-परिणत भी। संस्थान से कोई परिमण्डल संस्थान-परिणत भी होते हैं, वृत्तसंस्थान-परिणत भी, यस्रसंस्थान-परिणत, भी, चतुरस्रसंस्थान-परिणत भी होते हैं और अायतसंस्थान-परिणत भी / / 20 / / [5] जे वण्णो सुक्किलवण्णपरिणता ते गंधग्रो सुन्भिगंधपरिणता वि दुन्भिगंधपरिणता वि, रसो तित्तरसपरिणता वि कडुयरसपरिणता वि कसायरसपरिणता वि अविलरसपरिणता वि महुर रणता वि 20 / Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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