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________________ पांचवां विशेषपव (पर्यायपद)] [439 यह हुई रूपी-अजीव-पर्यायों की प्ररूपणा / और इस प्रकार अजीवपर्याय-सम्बन्धी निरूपण भी पूर्ण हुआ। विवेचन-जधन्यादियुक्त सामान्य पुदगल-स्कन्धों की विभिन्न अपेक्षानों से पर्याय-प्ररूपणाप्रस्तुत पांच सूत्रों (सू. 554 से 558 तक) में जघन्य-मध्यम-उत्कृष्ट प्रदेशी स्कन्धों, तथा जघन्यादि गुण विशिष्ट अवगाहना, स्थिति, तथा कृष्णादि वर्गों, गन्ध-रस-स्पर्शों के पर्यायों की विभिन्न अपेक्षाओं से प्ररूपणा की गई है। __ मध्यमगुण काले पुद्गल स्वस्थान में षट्स्थानपतित होनाधिक-एक मध्यमगुण काले पुद्गल से दूसरे मध्यमगुण काले पुद्गल में कृष्णवर्ण की अनन्तभागहीनता या अनन्तगुणहीनता, तथैव अनन्तंभाग-अधिकता अथवा अनन्तगुण-अधिकता भी हो सकती है, क्योंकि मध्यमगुण के अनन्त विकल्प हैं। इसी तरह मध्यमगुण वाले सभी वर्णादि स्पर्शपर्यन्त स्वस्थान में षट्स्थानपतित होते हैं / उत्कृष्ट प्रवगाहना वाले अनन्तप्रदेशी स्कंध की स्थिति तल्य क्यों ?—उत्कृष्ट अवगाहना वाला, अनन्त प्रदेशी स्कंध सर्वलोकव्यापी होता है वह या तो अचित्त महास्कंध होता है अथवा केवलीसमुद्घात की अवस्था में कर्मस्कंध हो सकता है। इन दोनों का काल दण्ड, कपाट, प्रतर और अन्तरपूरण रूप चार समय का ही होता है / अतएव इसको स्थिति समान कही गई है। // प्रज्ञापनासूत्र : पंचम विशेषपद (पर्यायपद) समाप्त // 1. प्रज्ञापनासूत्र प्रमेयबोधिनी टीका भा. 2, पु. 927 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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