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________________ पांचवाँ विशेषपद (पर्यायपद)j [ 421 [उ.] गौतम ! मध्यम अवगाहना वाला अनन्तप्रदेशी स्कन्ध, दूसरे मध्यम अवगाहना वाले अनन्तप्रदेशी स्कन्ध से द्रव्य की अपेक्षा से तुल्य है, प्रदेशों की अपेक्षा से षट्स्थानपतित है, अवगाहना की दृष्टि से चतुःस्थानपतित है, स्थिति की अपेक्षा से षट्स्थानपतित है और वर्णादि तथा अष्ट स्पर्शी की अपेक्षा से षट्स्थानपतित है। 532. [1] जहण्णठितीयाणं भंते ! परमाणुपोग्गलाणं पुच्छा। गोयमा ! प्रणंता। से केणठेणं? गोयमा ! जहण्णठितीए परमाणुपोग्गले जहण्णठितीयस्स परमाणुपोग्गलस्स दवट्ठयाए तुल्ले, पदेसठ्ठयाए तुल्ले, प्रोगाहणठ्याए तुल्ले, ठितीए तुल्ले, वण्णादि-दुफासेहि य छाणवड़िते। [532-1 प्र.] भगवन् ! जघन्य स्थिति वाले परमाणुपुद्गल के कितने पर्याय कहे गए हैं ? [532-1 उ.] गौतम ! (उसके) अनन्त पर्याय (कहे हैं / ) [प्र] भगवन् ! किस कारण से ऐसा कहा जाता है (कि जघन्य स्थिति वाले परमाणुपुद्गलों के अनन्त पर्याय हैं ?) [उ.] गौतम ! एक जघन्य स्थिति वाला परमाणुपुद्गल, दूसरे जघन्य स्थिति वाले परमाणपुद्गल से द्रव्य की अपेक्षा से तुल्य है, प्रदेशों की अपेक्षा से तुल्य है, अवगाहना की अपेक्षा से तुल्य है तथा स्थिति की अपेक्षा से (भी) तुल्य है एवं वर्णादि तथा दो स्पर्शो की अपेक्षा से षट्स्थानपतित है। [2] एवं उक्कोसठितीए वि। [532-2] इसी प्रकार उत्कृष्ट स्थिति वाले (परमाणुपुद्गलों के पर्यायों) के विषय में (समझना चाहिए / ) [3] अजहण्णमणुक्कोसठितीए वि एवं चेव / नवरं ठितोए चउट्ठाणवड़िते। [532-3] मध्यम स्थिति वाले (परमाणुपुद्गलों के पर्यायों) के विषय में भी इसी प्रकार (कहना चाहिए / ) विशेष यह है कि स्थिति की अपेक्षा से चतुःस्थानपतित है। 533. [1] जहण्णठितीयाण दुपएसियाणं पुच्छा। गोयमा ! अणंता। से केणढेणं भंते ! ? गोयमा ! जहण्णठितीए दुपएसिते जहण्णठितीयस्स दुपएसियस्स दस्वट्ठयाए तुल्ले, पदेसठ्ठयाए तुल्ले ; प्रोगाहणट्ठयाए सिय होणे सिय तुल्ले सिय अन्महिए / जति होणे पदेसहीणे, अह अभतिए पदेसम्भतिते, ठितीए तुल्ले, वण्णादि-चउष्फासेहि य छट्ठाणवडिते। [533-1 प्र.) भगवन् ! जघन्य स्थिति वाले द्विप्रदेशी स्कन्धों के कितने पर्याय कहे गए हैं ? [533-1 उ.] गौतम ! (उनके) अनन्त पर्याय कहे हैं। [प्र.] भगवन् ! किस कारण से ऐसा कहा जाता है कि जघन्य स्थिति वाले द्विप्रदेशी स्कन्धों के अनन्त पर्याय कहे हैं ? Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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