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________________ 418] [प्रज्ञापनासूत्र [2] उक्कोसोगाहणए वि एवं चेव / [526-2] इसी प्रकार उत्कृष्ट अवगाहना वाले त्रिप्रदेशी पुद्गलों के पर्यायों के विषय में कहना चाहिए। [3] एवं अजहण्णमणुक्कोसोगाहणए वि। [526-3] इसी तरह मध्यम अवगाहना वाले त्रिप्रदेशी पुद्गलों के (पर्यायों के) विषय में (कहना चाहिए।) 527. [1] जहण्णोगाहणयाणं भंते ! चउपएसियाणं पुच्छा। गोयमा ! जहा जहण्णोगाहणए दुपएसिते तहाँ जहण्णोगाहणए चउपएसिते / [527-1 प्र.] भगवन् ! जघन्य अवगाहना वाले चतुःप्रदेशी पुद्गलों के पर्याय कितने [527-1 उ.] गौतम ! जघन्य अवगाहना वाले चतुःप्रदेशी पुद्गल-पर्याय जघन्य अवगाहना वाले द्विप्रदेशी पुद्गलों के पर्याय की तरह (समझना चाहिए।) [2] एवं जहा उक्कोसोगाहणए दुपएसिए तहा उक्कोसोगाहणए चउप्पएसिए वि। [527-2] जिस प्रकार उत्कृष्ट अवगाहना वाले द्विप्रदेशी पुद्गलों के पर्यायों का कथन किया गया है, उसी प्रकार उत्कृष्ट अवगाहना वाले चतु:प्रदेशी पुद्गल-पर्यायों का कथन करना चाहिये। [3] एवं अजहण्णमणुक्कोसोगाहणए वि चउच्पएसिते। णवरं प्रोगाहणट्ठयाते सिय हीणे सिय तुल्ले सिय अभइए-जति होणे पएसहीणे, प्रहऽमइते पएसम्भतिए / [527-3] इसी प्रकार मध्यम अवगाहना वाले चतुःप्रदेशी स्कन्ध का पर्यायविषयक कथन करना चाहिए। विशेष यह है कि अवगाहना की अपेक्षा से कदाचित् हीन, कदाचित् तुल्य, कदाचित् अधिक होता है। यदि हीन हो तो एक प्रदेशहीन होता है, यदि अधिक हो तो एकप्रदेश अधिक होता है। 528. एवं जाव दसपएसिए यवं / गवरमजहण्णुक्कोसोगाहणए पदेसपरिवुड्डी कातव्वा, जाव दसपएसियस्स सत्त पएसा परिवटिज्जति / [528] इसी प्रकार यावत् दशप्रदेशी स्कन्ध तक का (पर्यायविषयक कथन करना चाहिए / ) विशेष यह है कि मध्यम अवगाहना वाले में एक-एक प्रदेश की परिवृद्धि करनी चाहिए / इस प्रकार यावत् दशप्रदेशी तक सात प्रदेश बढ़ते हैं। 526. [1] जहष्णोगाहणगाणं भंते ! संखेज्जपएसियाणं पुच्छा। गोयमा ! अणंता। से केण?णं भंते ! एवं वुच्चति ? गोयमा! जहण्णोगाहणगे संखेज्जपएसिए जहण्णोगाणगस्स संखेज्जपएसियस्स दध्वट्ठयाते तुल्ले, पएसद्वयाते दुट्टाणवडिते. प्रोगाहणट्टयाते तुल्ले, ठितीए चउठाणवडिए, वण्णादि-चउफासपज्जवेहि य छाणवडिते। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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