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________________ पांचवाँ विशेषपद (पर्यायपद)] [ 417 ____गोयमा ! जहण्णोगाहणए दुपएसिए खंधे जहण्णोगाहणगस्स दुपएसियस्स खंधस्स दवट्ठयाए तुल्ले, पएसठ्ठयाए तुल्ले, प्रोगाहणठ्ठयाए तुल्ले, ठितीए चउट्ठाणवडिते, कालवग्णपज्जवेहि छट्ठाणवडिते, सेसवण्ण-गंध-रसपज्जवेहिं छट्ठाणवडिते, सोय-उसिण-णिद्ध-लुक्खफासपज्जवेहि छट्ठाणवडिते, से तेणठेणं गोतमा ! एवं बुच्चति जहण्णोगाहणगाणं दुपएसियाणं पोग्गलाणं अणंता पज्जवा पण्णत्ता। [525-1 प्र.] भगवन् ! जघन्य अवगाहना वाले द्विप्रदेशी पुद्गलों के कितने पर्याय कहे गए हैं ? {525-1 उ.] गौतम ! उनके अनन्त पर्याय कहे हैं। [प्र.] भगवन् ! किस कारण से ऐसा कहा जाता है कि जघन्य अवगाहना वाले द्विप्रदेशी पुद्गलों के अनन्त पर्याय हैं ? [उ.] गौतम ! एक जघन्य अवगाहना वाला द्विप्रदेशी स्कन्ध, दूसरे जघन्य अवगाहना वाले द्विप्रदेशी स्कन्ध से द्रव्य की अपेक्षा से तुल्य है, प्रदेशों की अपेक्षा से भी तुल्य है, अवगाहना की अपेक्षा से तुल्य है, (किन्तु) स्थिति की अपेक्षा से चतुःस्थानपतित है, कृष्ण वर्ण के पर्यायों की दृष्टि से षट्स्थानपतित है, शेष वर्ग, गन्ध और रस के पर्यायों की दृष्टि से षट्स्थानपतित है तथा शीत, उष्ण, स्निग्ध और रूक्ष स्पर्श के पर्यायों की अपेक्षा से षट्स्थानपतित है। हे गौतम ! इस कारण से ऐसा कहा जाता है कि जघन्य अवगाहना वाले द्विप्रदेशिक पुद्गलों के अनन्त पर्याय कहे हैं। [2] उक्कोसोगाहणए वि एवं चेव / [525-2] उत्कृष्ट अवगाहना वाले [द्विप्रदेशी पुद्गल-(स्कन्धों) के पर्यायों] के विषय में भी इसी प्रकार (कहना चाहिए / ) [3] अजहण्णमणुक्कोसोगाहणो नत्यि। [525-3] अजघन्य-अनुत्कृष्ट (मध्यम) अवगाहना वाले द्विप्रदेशी स्कन्ध नहीं होते। 526. [1] जहण्णोगाहणयाणं भंते ! तिपएसियाणं पुच्छा। गोयमा ! अणंता पज्जवा / से केणढेणं भंते ! एवं बुच्चति ? गोयमा ! जहा दुपएसिते जहण्णोगाहणते / [526-1 प्र.] भगवन् ! जघन्य अवगाहना वाले त्रिप्रदेशी पुद्गलों के कितने पर्याय कहे गए हैं ? [526-1 उ.] गौतम ! उनके अनन्त पर्याय कहे गए हैं। [प्र.] भगवन् ! किस हेतु से ऐसा कहा जाता है कि जघन्य अवमाहना वाले त्रिप्रदेशी पुद्गलों के अनन्त पर्याय हैं ? [3] गौतम ! जैसे जघन्य अवगाहना वाले द्विप्रदेशी (पुद्गलों की पर्यायविषयक वक्तव्यता कही है,) वैसी हो (वक्तव्यता) जघन्य अवगाहना वाले त्रिप्रदेशी पुद्गलों के विषय में कहनी चाहिए / Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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