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________________ पांचयाँ विशेषपद (पर्यायपद)] [ 415 प्रदेशहीन परमाण में अनन्त पर्याय कैसे?-परमाणु को जो 'अप्रदेशी' कहा गया है, वह सिर्फ द्रव्य की अपेक्षा से है, काल और भाव की अपेक्षा से वह अप्रदेशी या निरंश नहीं है / __ परमाणः चतःस्पर्शी और षटस्थानपतित-एक परमाणु में आठ स्पों में से सिर्फ चार स्पर्श ही होते हैं। वे ये हैं--शीत, उष्ण, स्निग्ध और रूक्ष / बल्कि असंख्यातप्रदेशी स्कन्ध तक में ये चार ही स्पर्श होते हैं। कोई-कोई अनन्तप्रदेशी स्कन्ध भी चार स्पर्श वाले होते हैं। इसी प्रकार एकप्रदेशावगाढ से लेकर संख्यातप्रदेशावगाढ पुद्गल (स्कन्ध) भी चार स्पर्शों वाले होते हैं। अत: इन अपेक्षाओं से परमाणु को षट्स्थानपतित समझना चाहिए।' द्विप्रदेशी स्कन्ध अवगाहना को दष्टि से हीन, अधिक और तल्य : क्यों और कैसे ?–जब दो द्विप्रदेशी स्कन्ध प्रकाश के दो-दो प्रदेशों या दोनों---एक-एक प्रदेश में अवगाढ हों, तब उनकी अवगाहना तल्य होती है। किन्तु जव एक द्विप्रदेशी स्कन्ध एक प्रदेश में अवगाढ हो और दूसरा दो प्रदेशों में, तब उनमें अवगाहना की दृष्टि से हीनाधिकता होती है। जो एक प्रदेश में अवगाढ है, वह दो प्रदेशों में अवगाढ स्कन्ध की अपेक्षा एक प्रदेश हीन अवगाहना वाला कहलाता है, जबकि दो प्रदेशों में अवगाढ स्कन्ध एकप्रदेशावगाढ की अपेक्षा एकप्रदेश-अधिक अवगाहना वाला कहलाता है। द्विप्रदेशी स्कन्धों को अवगाहना में इससे अधिक होनाधिकता सभव नहीं है। त्रिप्रदेशो स्कन्धों में होनाधिकता : अवगाहना की दृष्टि से-तीन प्रदेशों का पिण्ड त्रिप्रदेशी स्कन्ध कहलाता है / वह आकाश के एक प्रदेश में भी रह सकता है, दो प्रदेशों में भी और तीन आकाश प्रदेशों में भी रह सकता है / तीन अाकाशप्रदेशों से अधिक में उसको अवगाहना संभव नहीं। स्थति में यदि त्रिप्रदेशी स्कन्धों की अवगाहना में हीनता और अधिकता हो तो एक या दो प्राकाशप्रदेशों की ही हो सकती है. अधिक की नहीं। दशप्रदेशी स्कन्ध तक की होनाधिकता : अवगाहना की दष्टि से-जब दो त्रिप्रदेशी स्कन्ध तीन-तीन प्रदेशों में, दो-दो प्रदेशों में या एक-एक प्रदेश में अवगाढ होते हैं, तब वे अवगाहना की दृष्टि से परस्पर तुल्य होते हैं, किन्तु जब एक त्रिप्रदेशीस्कन्ध त्रिप्रदेशावगाढ और दूसरा द्विप्रदेशावगाढ होता है, तब वह एकप्रदेशहीन होता है। यदि दूसरा एकप्रदेशाबगाढ होता है तो वह द्विप्रदेशहीन होता है और वह त्रिप्रदेशावगाढ़ द्विप्रदेशावगाढ़ से एकप्रदेशाधिक और एकप्रदेशावगाढ से द्विप्रदेशाधिक होता है। इस प्रकार एक-एक प्रदेश बढ़ा कर चारप्रदेशी से दशप्रदेशी तक के स्कन्धों में अवगाहना की अपेक्षा से हानिवृद्धि का कथन कर लेना चाहिए। इस दृष्टि से दशप्रदेशी स्कन्ध में होनाधिकता इस प्रकार कही जाएगी-दशप्रदेशी स्कन्ध जब हीन होता है तो एकप्रदेशहीन, द्विप्रदेशहीन यावत् नौप्रदेशहीन होता है और अधिक तो एकप्रदेशाधिक यावत् नवप्रदेशाधिक होता है / / संख्यातप्रदेशी स्कन्ध की अनन्तपर्यायता-संख्यातप्रदेशी स्कन्ध, दूसरे संख्यातप्रदेशी स्कन्ध से द्रव्य-दृष्टि से तुल्य होता है / वह द्रव्य है, इस कारण अनन्तपर्याय वाला भी है, क्योंकि प्रत्येक द्रव्य अनन्तपर्याययुक्त होता है / प्रदेशों की दृष्टि से वह हीन, तुल्य या अधिक भी हो सकता है / यदि हीन या अधिक हो तो संख्यातभाग हीन या संख्यातगुण हीन अथवा संख्यातभाग अधिक या संख्यातगुण ..----- ... -- 1. (क) प्रज्ञापनासूत्र म. वृत्ति, पत्रांक 201, 2. (क) प्रज्ञापना. म. वृत्ति, पत्रांक 201, (ख) प्रज्ञापना. प्रमेयवोधिनी पृ. 798-801 (ख) प्रज्ञापना. प्र. बो. टीका पृ. 806-807 For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org Jain Education International
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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