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________________ 414] [प्रज्ञापनासूत्र 522. एवं असंखेज्जगुणकालए वि / णवरं सट्ठाणे चउट्ठाणवडिते / [522] इसी प्रकार असंख्यातगुण काले (पुद्गलों) की पर्यायसम्बन्धी वक्तव्यता समझनी चाहिए। विशेष यह है कि (वे) स्वस्थान में चतुःस्थानपतित हैं / 523. एवं अणंतगुणकालए वि / नवरं सट्ठाणे छट्ठाणवड़िते / [523] इसी तरह अनन्तगुण काले (पुद्गलों) की पर्यायसम्बन्धी वक्तव्यता जाननी चाहिए / विशेष यह है कि (वे) स्वस्थान में षट्स्थानपतित हैं। 524. एवं जहा कालवण्णस्स बत्तब्वया भणिया तहा सेसाण वि वण्ण-गंध-रस-फासाणं वतव्वया भाणितवा जाव प्रणतगुणलुक्खे। [524] इसी प्रकार जैसे कृष्णवर्ण वाले (पुद्गलों) की (पर्यायसम्बन्धी वक्तव्यता कही है,) वैसे ही शेष सब वर्गों, गन्धों, रसों और स्पर्णी (वाले पुद्गलों) की (पर्यायसम्बन्धी) वक्तव्यता यावत् अनन्तगुण रूक्ष (पुद्गलों) की (पर्यायों सम्बन्धी) वक्तव्यता तक कहनी चाहिए। विवेचन-परमाणुपुदगल आदि की पर्यायसम्बन्धी प्ररूपणा--प्रस्तुत इक्कीस सूत्रों (सू. 504 से 524 तक) में विविध प्रकार के पुद्गलों की विभिन्न अपेक्षाओं से पर्यायसम्बन्धी प्ररूपणा को रूपी-अजीव-पर्यायप्ररूपणा का क्रम- (1) परमाणुपुद्गल तथा द्वि-त्रि-दश-संख्यातअसंख्यात-अनन्तप्रदेशिक पुद्गलों के विषय में, (2) प्राकाशीय एकप्रदेशावगाढ से लेकर असंख्यातप्रदेशावगाढ पुदगलों के विषय में, (3) एकसमयस्थितिक से असंख्यातसमयस्थितिक पुदगलो के विषय में, (4) एकगुण कृष्ण से अनन्त गुण कृष्ण पुद्गलों के विषय में तथा शेष वर्ण-गन्ध-रस-स्पर्श पुद्गलों के विषय में पर्याय-प्ररूपणा क्रमश: को गई है / ' परमाणुपुदगलों में अनन्तपर्यायों की सिद्धि-प्रस्तुत में यह प्रतिपादन किया गया है कि परमाणु द्रव्य और प्रत्येक द्रव्य अनन्त पर्यायों से युक्त होता है / एक परमाणु दूसरे परमाणु से द्रव्य, प्रदेश और अवगाहना की दृष्टि से तुल्य होता है, क्योंकि प्रत्येक परमाणु एक-एक स्वतंत्र द्रव्य है / वह निरंश ही होता है तथा नियमतः आकाश के एक ही प्रदेश में अवगाहन करके रहता है / इसलिए इन तीनों की अपेक्षा से वह तुल्य है। किन्तु स्थिति की अपेक्षा से एक परमाणु दूसरे परमाणु से चतु:स्थानपतित हीनाधिक होता है, क्योंकि परमाण की जघन्य स्थिति एक समय की और उत्कृष्ट असंख्यात काल को है, अर्थात-कोई पदगल परमाणरूप पर्याय में कम से कम एक समय तक रहता है और अधिक से अधिक असंख्यात काल तक रह सकता है। इसलिए सिद्ध है कि एक परमाणु दूसरे परमाणु से चतु:स्थानपतित हीन या अधिक होता है तथा वर्ण, गन्ध, रस एवं स्पर्श, विशेषतः चतुःस्पर्शों की अपेक्षा परमाणु-पुद्गल में षट्स्थानपतित होनाधिकता होती है। अर्थात्-- वह असंख्यात-संख्यात-अनन्तभागहीन, या संख्यात-असंख्यात-अनन्तगुण हीन अथवा असंख्यात-संख्यातअनन्तभाग अधिक अथवा संख्यात-असंख्यात-अनन्तगुण अधिक है। 1. पण्णवणासुत्तं (मूलपाठटिप्पणयुक्त) भाग 1, पृ. 151 से 154 तक Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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