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________________ पांचवां विशेषपद (पर्यायपद)] [411 511. एगपएसोगाढाणं पोग्गलाणं पुच्छा / गोयमा ! प्रणेता पज्जवा पण्णत्ता / से केणठेणं भंते ! एवं वुच्चति ? गोयमा ! एगपएसोगाढ-पोग्गले एगपएसोगाढस्स पोग्गलस्स दवट्ठयाए तुल्ले, पएसठ्ठयाए छट्ठाणवडिते, अोगाहणव्याते तुल्ले, ठितीए चउट्ठाणवडिते, वण्णादि-उवरिल्लचउफासेहि य छाणवड़िते। [511 प्र.] भगवन् ! एक प्रदेश में अवगाढ पुद्गलों के कितने पर्याय कहे गए हैं ? [511 उ.] गौतम ! (उनके) अनन्त पर्याय कहे हैं / [प्र. भगवन् ! किस कारण से ऐसा कहा जाता है कि एक प्रदेश में अवगाढ पुद्गलों के अनन्त पर्याय हैं ? उ.] गौतम ! एक प्रदेश में अवगाढ एक पुद्गल, दूसरे एक प्रदेश में अवगाढ पुद्गल से द्रव्य को अपेक्षा से तुल्य है, प्रदेशों की अपेक्षा से षट्स्थानपतित है, अवगाहना की अपेक्षा से तुल्य है, स्थिति की अपेक्षा मे चतुःस्थानपतित है, वर्णादि तथा उपर्युक्त चार स्पों की अपेक्षा से षट्स्थानपतित है। 512. एवं दुपएसोगाढे वि जाव दसपएसोगाढे / [512] इसी प्रकार द्विप्रदेशावगाढ से दशप्रदेशावगाढ स्कन्धों तक के पर्यायों की वक्तव्यता समझ लेना चाहिए। 513. संखेज्जपएसोगाढाणं पुच्छा। गोयमा ! प्रणता। से केणठेणं भंते ! एवं वुच्चति ? गोयमा ! संखेज्जपएसोगाढे पोग्गले संखेज्जपएसोगाढस्स पोग्गलस्स दवट्ठयाए तुल्ले, पएसठ्ठयाए छठाणवडिते, प्रोगाहणठ्ठयाए दुट्ठाणवडिते, ठितोए चउट्ठाणवीडिते, वण्णाइ-उबरिल्लचउफासेहि य छठाणवडिते / {513 प्र.} भगवन् ! संख्यातप्रदेशावगाढ स्कन्धों के कितने पर्याय कहे गए हैं ? [513 उ.] गौतम ! (उनके ) अनन्त पर्याय कहे हैं। [प्र.] भगवन् ! किस हेतु से ऐसा कहा जाता है कि संख्यातप्रदेशावगाढ स्कन्धों (पुद्गलों) के अनन्त पर्याय हैं ? [उ.] गौतम ! एक संख्यातप्रदेशावगाढ पुद्गल, दूसरे संख्यातप्रदेशावगाढ पुद्गल से द्रव्य की अपेक्षा तुल्य है, प्रदेशों की अपेक्षा से षट्स्थानपतित है, अवगाहना की अपेक्षा से द्विस्थानपतित है, स्थिति की अपेक्षा से चतुःस्थानपतित है, वर्णादि तथा उपर्युक्त चार स्पर्शों को अपेक्षा से षट्स्थानपतित है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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