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________________ 374 ] [प्रज्ञापनासूत्र विवेचन--वाणव्यन्तर, ज्योतिष्क और वैमानिक देवों के अनन्त पर्यायों को प्ररूपणा-प्रस्तुत दो सूत्रों (453, 454) में वाणव्यन्तर, ज्योतिष्क और वैमानिकों के अनन्त पर्याय बताने हेतु उनकी यथायोग्य चतु:स्थानपतित षट्स्थानपतित तथा त्रिस्थानपतित न्यूनाधिकता का प्रतिपादन किया गया है।' वाणव्यन्तरों को चतुःस्थानपतित तथा ज्योतिष्क-वैमानिकों की त्रिस्थानपतित होनाधिकतावाणव्यन्तरों की स्थिति जघन्य 10 हजार वर्ष को, उत्कृष्ट एक पल्योपम को होती है, अतः वह भी चतःस्थानपतित हो सकती है, किन्त ज्योतिष्कों और वैमानिकों की स्थिति हीनाधिकता ही होती है। क्योंकि ज्योतिष्कों को स्थिति जघन्य पल्योपम के आठवें भाग को और उत्कृष्ट एक लाख वर्ष अधिक पल्योपम की है। अतएव उनमें असंख्यातगुणी हानि-वृद्धि संभव नहीं है / वैमानिकों की स्थिति जघन्य पल्योपम की और उत्कृष्ट तेतीस सागरोपम की है। एक सागरोपम दस कोड़ाकोड़ी पल्योपम का होता है। अतएव वैमानिकों में भी असंख्यातगुणी हानिवृद्धि संभव नहीं है। इसी कारण ज्योतिष्क और वैमानिकदेव स्थिति को अपेक्षा से त्रिस्थानपतित होनाधिक ही होते हैं / विभिन्न अपेक्षाओं से जघन्यादियुक्त अवगाहनादि वाले नारकों के पर्याय 455. [1] जहण्णोगाहणगाणं भंते ! नेरइयाणं केवतिया पज्जवा पण्णत्ता? गोयमा ! अणंता पज्जवा पण्णत्ता। से केणठेणं भंते ! एवं वुच्चति जहण्णोगाहणगाणं नेरइयाणं अणता पज्जवा पण्णत्ता ? गोयमा ! जहण्णोगाहणए नेरइए जहण्णोगाहणगस्स नेरइयस्स दवट्ठयाए तुल्ले, पएसट्टयाए तुल्ले, प्रोगाहणट्टयाए तुल्ले, ठितोए चउट्ठाणवडिते, वण्ण-गंध-रस-फासपज्जवेहि तिहिं णाणेहिं तिहिं अण्णाहिं तिहि सणेहि य छट्ठाणवडिते। [455-1 प्र.] भगवन् ! जघन्य अवगाहना वाले नैरयिकों के कितने पर्याय कहे गए हैं ? [455-1 उ.] गौतम ! (उनके) अनन्त पर्याय कहे हैं / [प्र.] भगवन् ! किस कारण से ऐसा कहा जाता है कि 'जघन्य अवगाहना वाले नारकों के अनन्त पर्याय हैं ?' [उ.] गौतम ! एक जघन्य अवगाहना वाला नैरयिक, दूसरे जघन्य अवगाहना वाले नैरयिक से द्रव्य की अपेक्षा से तुल्य है, प्रदेशों की अपेक्षा से (भी) तुल्य है; अवगाहना की अपेक्षा से (भी) तुल्य है; (किन्तु) स्थिति की अपेक्षा से चतु:स्थान पतित (हीनाधिक) है, और वर्ण गन्ध, रस और स्पर्श के पर्यायों, तीन ज्ञानों, तीन अज्ञानों और तीन दर्शनों की अपेक्षा से षट्स्थानपतित है / [2] उक्कोसोगाहणयाणं भंते ! नेरइयाणं केवतिया पज्जवा पण्णता ? गोयमा! अणंता पज्जवा पण्णत्ता। से केणठेणं भंते ! एवं वुच्चति उक्कोसोगाहणयाणं नेरइयाणं प्रणता पज्जवा पण्णता ? 1. पण्णवणासुत्तं (मूलपाठ-टिप्पणयुक्त), पृ. 140 2. प्रज्ञापनासूत्र म. वृत्ति, पत्रांक 186 For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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