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________________ पाँचवाँ विशेषपद (पर्यायपद)] [373 [उ.] गौतम ! द्रव्य की अपेक्षा से एक मनुष्य, दूसरे मनुष्य से तुल्य है, प्रदेशों की अपेक्षा से भी तुल्य है, (किन्तु) अवगाहना की दृष्टि से चतु:स्थानपतित (हीनाधिक) है, स्थिति की दृष्टि से भी चतुःस्थानपतित (हीनाधिक) है, तथा वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, आभिनिबोधिक ज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान एवं मनःपर्यवज्ञान के पर्यायों की अपेक्षा से षट्स्थानपतित (हीनाधिक) है, तथा केवलज्ञान के पर्यायों की दृष्टि से तुल्य है, तीन अज्ञान तथा तीन दर्शन (के पर्यायों) की दृष्टि से षट्स्थानपतित है, और केवल दर्शन के पर्यायों की अपेक्षा से तुल्य है / विवेचन-मनुष्यों के अनन्तपर्यायों को सयुक्तिक प्ररूपणा–प्रस्तुत सूत्र (452) में अवगाहना और स्थिति की दृष्टि से चतुःस्थानपतित तथा वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, आभिनिबोधिक आदि चार ज्ञानों, तीन अज्ञानों और तीन दर्शनों की अपेक्षा से षट्स्थानपतित होनाधिकता बता कर तथा द्रव्य, प्रदेश तथा केवलज्ञान-केवलदर्शन के पर्यायों की अपेक्षा से परस्पर तुल्यता बता कर मनुष्यों के अनन्त पर्याय सिद्ध किये गए हैं। चार ज्ञान, तीन अज्ञान, और तीन दर्शनों को होनाधिकता-पांच ज्ञानों में से चार ज्ञान, तीन अज्ञान और तीन दर्शन क्षायोपशमिक हैं। वे ज्ञानावरण और दर्शनावरण के क्षयोपशम से उत्पन्न होते हैं, किन्तु सब मनुष्यों का क्षयोपशम समान नहीं होता / क्षयोपशम में तरतमता को लेकर अनन्तभेद होते हैं। अतएव इनके पर्याय षस्थानपतित हीनाधिक कहे गये हैं, किन्तु केवल और केवलदर्शन क्षायिक है। वे ज्ञानावरण और दर्शनावरण के सर्वथा क्षीण होने पर ही उत्पन्न होते हैं, अतएव उनमें किसी प्रकार की न्यूनाधिकता नहीं होती। जैसा एक मनुष्य का केवलज्ञान या केवलदर्शन होता है, वैसा ही सभी का होता है, इसीलिए केवलज्ञान और केवलदर्शन के पर्याय तुल्य कहे हैं / स्थिति की अपेक्षा से चतुःस्थानपतित कैसे—पंचेन्द्रियतिर्यंचों और मनुष्यों की स्थिति अधिक से अधिक तीन पल्योपम की होती है। पल्योपम असंख्यात हजार वर्षों का होता है। अतः उसमें असंख्यातगुणी वृद्धि और हानि सम्भव होने से उसे चतुःस्थानपतित कहा गया है / वारणव्यन्तर, ज्योतिष्क और वैमानिक देवों के अनन्त पर्यायों की प्ररूपरणा 453. वाणमंतरा प्रोगाहणट्टयाए ठितीए य चउट्ठाणवडिया, वण्णादीहिं छट्ठाणवडिता / [453] वाणव्यन्तर देव अवगाहना और स्थिति की अपेक्षा से चतुःस्थानपतित (हीनाधिक) कहे गए हैं तथा वर्ण आदि (के पर्यायों) की अपेक्षा से षट्स्थानपतित (होनाधिक) हैं / 454. जोइसिय-वेमाणिया वि एवं चेव / णवरं ठितीए तिट्ठामवडिता / [454[ ज्योतिष्क और वैमानिक देवों (के पर्यायों) की हीनाधिकता भी इसी प्रकार (पूर्वसूत्रानुसार समझनी चाहिए।) विशेषता यह है कि इन्हें स्थिति को अपेक्षा से त्रिस्थानपतित (हीनाधिक) समझना चाहिए / 1. पण्णवणासुत्त (मूलपाठ-टिप्पण युक्त), पृ. 139-140 2. (क) प्रज्ञापनासूत्र, मलयवत्ति, पत्रांक 186, (ख) प्रज्ञापना. प्रमेयबोधिनी टीका भा-२, पृ. 612-613 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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