________________ [प्रज्ञापनासूत्र क्षेत्र, काल, और भाव अथवा पूर्वोक्त दस दृष्टियों से किया गया है। परमाणु से लेकर अनन्त प्रदेशी पूदगलस्कन्ध तक के पर्यायों का निरूपण करते हए शास्त्रकार कहते हैं कि लोकाकाश असंख्यातप्रदेशी है, तथापि अनन्तप्रदेशी स्कन्ध भी एक से लेकर असंख्यातप्रदेश में समा सकता है। इसे प्रदीप के दृष्टान्त द्वारा समझाया गया है। इसी प्रकार परमाणु को तरह स्कन्धों की स्थिति एक समय से लेकर असंख्यात काल से अधिक नहीं है / वर्णादि पर्याय भी अनन्त हैं। तदनन्तर स्थिति, अवगाहना और वर्णादिकृत भेदों में भी जघन्य, उत्कृष्ट और मध्यम, इन तीन प्रकारों की अपेक्षा से भी पर्याय का विचार किया है / ' अन्य दर्शनीय मान्यता से अन्तर- यह है कि द्रव्य के यदि पर्याय (परिणाम) होते हैं तो वह द्रव्य कूटस्थनित्य नहीं, किन्तु परिणामिनित्य मानना चाहिए। परमाणुवादी नैयायिक वैशेषिक परमाणु को कूटस्थनित्य मानते हैं जबकि जैनदर्शन परिणामिनित्य मानता है / तथा स्कन्ध और परमाणु में अवयव-अवयवी का प्रात्यन्तिक भेद भी जैनदर्शन नहीं मानता, न ही परमाणु में पार्थिवपरमाणु आदि के रूप में जाति-भेद मानता है, तथा परमाणु में रूप रसादि चारों का होना अनिवार्य मानता है। 1. पण्णवणासुत्त मू. पा सू. 500 से 558 तक तथा प्रज्ञापना. म. वृत्ति पत्रांक 242, 2. पण्णवणासुत्त भा. 2, पंचमपद प्रस्तावना, पृ. 67 For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org