________________ 310] [प्रतापनासूत्र [359-2 उ.] गौतम ! (उनकी स्थिति) जघन्य अन्तर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट भी अन्तमुहूर्त की है। [3] पज्जत्तयाणं पुच्छा। गोयमा ! जहणणं अंतोमुहुत्तं, उक्कोसेणं सत्त वाससहस्साइं अंतोमुत्तूणाई। [356-3 प्र.] भगवन् ! पर्याप्त बादर अप्कायिक जीवों की स्थिति कितने काल की कही गई है ? [356-3 उ.] गौतम ! जघन्य अन्तर्मुहूर्त की तथा उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त कम सात हजार वर्ष की है। 360. [1] तेउकाइयाणं भंते ! केवतियं कालं ठिती पण्णता? गोयमा ! जहण्णेणं अंतोमुहुत्तं, उक्कोसेणं तिण्णि रातिदियाई / [360-1 प्र.] भगवन् ! तेजस्कायिक जीवों को कितने काल तक की स्थिति कही गई है ? [360-1 उ.] गौतम ! जघन्य अन्तर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट तीन रात्रि-दिन (अहोरात्र) को है। [2] अपज्जत्तयाणं पुच्छा / गोयमा ! जहणेण वि उक्कोसेण वि अंतोमुहुतं / [360-2 प्र.] भगवन् ! तेजस्कायिक अपर्याप्तकों को स्थिति कितने काल को कही गई है? [360-2 उ.] गौतम ! जघन्य भी अन्तर्मुहूर्त की है और उत्कृष्ट भी अन्तर्मुहूर्त को है। [3] पज्जत्तयाणं पुच्छा। गोयमा ! जहण्णेणं अंतोमुहत्तं, उक्कोसेणं तिण्णि रातिदियाई अंतोमुत्तूणाई / [360-3 प्र.] भगवन् ! पर्याप्त तेजस्कायिक जीवों की स्थिति कितने काल तक को कही __[360-3 उ.] गौतम ! जघन्य अन्तर्मुहूर्त को तथा उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त कम तीन रात्रिदिन की है। 361. सुहुमतेउकाइयाणं प्रोहियाणं अपज्जत्तयाणं पज्जत्तयाण य जहणेण वि उक्कोसेण वि अंतोमुहृत्तं / [361] सूक्ष्म तेजस्कायिकों के औधिक (सामान्य), अपर्याप्त और पर्याप्तकों की जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति भी अन्तर्मुहूर्त की है / 362. [1] बादरतेउकाइयाणं पुच्छा। गोपमा ! जहण्णेणं अंतोमुहुत्तं, उक्कोसेणं तिण्णि रातिदियाई / Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org