________________ [ 293 तृतीय बहुवक्तध्यतापद ] को अपेक्षा सयोगी विशेषाधिक हैं, क्योंकि इनमें सयोगीकेवली गुणस्थान तक के जीवों का समावेश हो जाता है / (97) सयोगियों की अपेक्षा संसारी जीव विशेषाधिक हैं, क्योंकि संसारी जीवों में अयोगीकेवली भी हैं और (98) संसारी जीवों की अपेक्षा सर्वजीव विशेषाधिक हैं, क्योंकि सर्वजीवों में सिद्धों का भी समावेश हो जाता है।' // प्रज्ञापनासूत्र : तृतीय बहुवक्तव्यतापद समाप्त / (क) 'तत्तो नपुसग खयरा संखेज्जा थलयर-जलयर-नपुसगा चरिन्दिय तो पणवितिपज्जत्त किंचि अहिरा।' -प्रज्ञापना. म. वृत्ति, प. 166 में उद्धत (ख) 'जीवाणमपज्जत्ता बहतरगा बायराण विन्नेया / सुहमाण य पज्जत्ता मोहेण य केवली बिंति // ' -प्रज्ञापना. म. वृत्ति, प. 167 में उद्धत (ग) प्रज्ञापनासूत्र मलय. वृत्ति, पत्रांक 166 से 168 तक / For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org