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________________ तृतीय बहुवक्तव्यतापव] [283 - [332 उ.] गौतम ! 1. द्रव्य की अपेक्षा से सबसे अल्प एक समय की स्थिति वाले पुद्गल हैं, 2. (उनको अपेक्षा) संख्यात समय को स्थिति वाले पुद्गल, द्रव्य को अपेक्षा से संख्यातगुण हैं, 3. (उनकी अपेक्षा) असंख्यात समय की स्थिति वाले पुद्गल, द्रव्य की अपेक्षा से असंख्यातगुणे हैं / प्रदेशों की अपेक्षा से अल्पबहुत्व-१. सबसे कम, एक समय की स्थिति वाले पुद्गल, प्रदेशों की अपेक्षा से हैं, 2. (उनको अपेक्षा) संख्यात समय को स्थिति वाले पुद्गल, प्रदेशों की अपेक्षा से संख्यातगुणे हैं, 3. (उनकी अपेक्षा) असंख्यात समय की स्थिति वाले पुद्गल, प्रदेशों की अपेक्षा से असंख्यातगुणे हैं। द्रव्य एवं प्रदेश की अपेक्षा से प्रल्पबहुत्व-१. द्रव्य एवं प्रदेश की अपेक्षा से सबसे कम पुद्गल, एक समय की स्थिति वाले हैं, 2. संख्यात समय की स्थिति वाले पुद्गल, द्रव्य की अपेक्षा से संख्यातगुणे हैं, 3. (इनकी अपेक्षा) वे (संख्यात समय की स्थिति वाले पुद्गल) ही प्रदेशों की अपेक्षा से संख्यातगुणे हैं, 4. (इनसे) असंख्यात समय की स्थिति वाले पुद्गल, द्रव्य की अपेक्षा से असंख्यातगुणे हैं, 5. (और इनसे भी) वे (असंख्यात-समयस्थितिक पुद्गल) ही प्रदेशों की अपेक्षा असंख्यातगुणे हैं। 333. एतेसि णं भंते ! एगगुणकालगाणं संखेज्जगुणकालगाणं असंखेज्जगुणकालगाणं अणंतगुणकालगाण य पोग्गलाणं दवट्टयाए पदेसट्टयाए दवटुपदेसट्टयाए कतरे कतरेहितो अप्पा वा बहुया वा तुल्ला वा विसेसाहिया वा ? ___ गोयमा! जहा परमाणुपोग्गला (सु. 330) तहा भाणितव्वा / एवं संखेज्जगुणकालयाण वि / एवं सेसा वि वण्ण-गंध-रसा भाणितव्या / फासाणं कक्खड-मउय गरुय-लहुयाणं जधा एगपदेसोगाढाणं (सु. 331) भणितं तहा भाणितव्वं / प्रवसेसा फासा जघा वण्णा मणिता तथा माणितन्वा / दारं 26 // [333 प्र.] भगवन् ! इन एकगुण काले, संख्यातगुण काले, असंख्यातगुण काले और अनन्तगुण काले पुद्गलों में से, द्रव्य की अपेक्षा से, प्रदेशों की अपेक्षा से और द्रव्य तथा प्रदेश की अपेक्षा से कौन किनसे अल्प, बहुत, तुल्य अथवा विशेषाधिक हैं ? 333 उ.] गौतम ! जिस प्रकार परमाणुपुद्गलों के विषय में (सू. 330 में) कहा गया है, उसी प्रकार यहाँ भी कहना चाहिए। इसी प्रकार संख्यातगुण काले (एवं असंख्यातगुण काले तथा अनन्तगुण काले) पुद्गलों के विषय में भी (पूर्ववत् सू. 330 के अनुसार) समझ लेना चाहिए। इसी प्रकार शेष वर्ण (नीले, लाल, पीले प्रादि) तथा (समस्त) गन्ध एवं रस के (एकगुण से अनन्तगुण तक के) पुद्गलों के अल्पबहुत्व के सम्बन्ध में कहना चाहिए तथा कर्कश, मृदु (कोमल), गुरु और लघु स्पर्शो के (अल्पबहुत्व के) विषय में भी जिस प्रकार (सू. 331 में) एकप्रदेशावगाढ़ आदि का (अल्पबहुत्व) कहा गया है, उसी प्रकार यहाँ भी कहना चाहिए / अवशेष (चार) स्पशों के विषय में जैसे वर्णों का (अल्पबहुत्व) कहा है, वैसे ही कहना चाहिए। छब्बीसवाँ (पुद्गल) द्वार // 26 // विवेचन-छन्वीसवां पुद्गलद्वार-प्रस्तुत आठ सूत्रों (सू. 326 से 333 तक) में पुद्गलद्वार के माध्यम से क्षेत्र एवं दिशा की अपेक्षा से पुद्गलों और द्रव्यों के तथा द्रव्य, प्रदेश, एवं द्रव्यप्रदेश की दृष्टि से परमाणुपुद्गल, संख्यातप्रदेशी आदि के एकप्रदेशावगाढ़ से असंख्यातप्रदेशावगाढ़ पुद्गलों Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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