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________________ 278] [ प्रमापनासूत्र गोयमा ! सव्वत्थोवा जीवा प्राउयस्स कम्मस्स बंधगा 1, अपज्जत्तया संखज्जगुणा 2, सुत्ता संखज्जगुणा 3, समोहता संखेज्जगुणा 4, सातवेदगा संखज्जगुणा 5, इंदिनोवउत्ता संखेज्जगुणा 6, अणागारोवउत्ता संखज्जगुणा 7, सागारोवउत्ता संखज्जगुणा 8, नोइंदियउवउत्ता विसेसाहिया , असातावेदगा विसेसाहिया 10, असमोहता विसेसाहिया 11, जागरा विसेसाहिया 12, पज्जत्तया विसेसाहिया 13, पाउयस्स कम्मस्स अबंधगा विसेसाहिया 14 / दारं 25 / / [325 प्र.] भगवन् ! इन आयुष्यकर्म के बन्धकों और अबन्धकों, पर्याप्तकों और अपर्याप्तकों, सुप्त और जागृत जीवों, समुद्घात करने वालों और न करने वालों, सातावेदकों और असातावेदकों, इन्द्रियोपयुक्तों और नो-इन्द्रियोपयुक्तों, साकारोपयोग में उपयुक्तों और अनाकारोपयोग में उपयुक्त जीवों में से कौन किनसे अल्प, बहुत, तुल्य अथवा विशेषाधिक हैं ? __[325 उ.] गौतम ! 1. सबसे थोड़े आयुष्यकर्म के बन्धक जीव हैं, 2. (उनकी अपेक्षा) अपर्याप्तक संख्यातगुणे हैं, 3. (उनकी अपेक्षा) सुप्तजीव संख्यातगुणे हैं, 4. (उनकी अपेक्षा) समुद्घात वाले संख्यातगुणे हैं, 5. (उनसे) सातावेदक संख्यातगुणे हैं, 6. (उनसे) इन्द्रियोपयुक्त संख्यातगुणे हैं, 7. (उनकी अपेक्षा) अनाकारोपयुक्त संख्यातगुणे हैं, 8. (उनकी अपेक्षा) साकारोपयुक्त संख्यातगुणे हैं, 9. (उनकी अपेक्षा) नो-इन्द्रियोपयुक्त जीव विशेषाधिक हैं, 10. (उनकी अपेक्षा) असातावेदक विशेषाधिक हैं, 11. (उनकी अपेक्षा) समुद्घात न करते हुए जीव विशेषाधिक हैं, 12. (उनकी अपेक्षा) जागृत विशेषाधिक हैं, 13. (उनसे) पर्याप्तक जीव विशेषाधिक हैं, 14. (और उनकी अपेक्षा भी) आयुष्यकर्म के अबन्धक जीव विशेषाधिक हैं। पच्चीसवाँ (बन्ध) द्वार // 25 / / विवेचन-पच्चीसौं बन्धद्वार-बन्धद्वार के माध्यम से प्रायुष्यकर्म के बन्धक-प्रबन्धक प्रादि जीवों का अल्पबहुत्व-प्रस्तुत सूत्र (325) में आयुष्यकर्म के बन्धक-प्रबन्धक, पर्याप्तकअपर्याप्तक, सुप्त-जागृत, समुद्घात-कर्ता-अकर्ता, सातावेदक-असातावेदक, इन्द्रियोपयुक्त-नो-इन्द्रियोपयुक्त एवं साकारोपयुक्त-अनाकारोपयुक्त; सामूहिक रूप से इन सात युगलों के अल्पबहुत्व का विचार किया गया है। अल्पबहुत्व का स्पष्टीकरण-आयुष्यकर्म के बन्धक जीव सबसे अल्प इसलिए हैं कि आयुष्यकर्म के बन्ध का काल प्रतिनियत और स्वल्प है / अनुभूयमान भव के आयुष्य का तीसरा भाग अवशेष रहने पर अथवा उस तीसरे भाग में से भी तीसरा भाग आदि अवशेष रहने पर ही जीव परभव का आयुष्य बांधते हैं / अतः त्रिभागों में से दो भाग अबन्धकाल और एक भाग बन्धकाल है और वह बन्धकाल भी अन्तर्मुहूर्त प्रमाण होता है। आयुष्यकर्म-बन्धकों की अपेक्षा अपर्याप्तक संख्यातगुणे कहे गए हैं / अपर्याप्तकों से सुप्त जीव संख्यातगुणे अधिक हैं, क्योंकि सुप्तजीव पर्याप्तक और अपर्याप्तक, दोनों में पाए जाते हैं और अपर्याप्तक की अपेक्षा पर्याप्तक संख्यातगुणे अधिक है। सुप्त जीवों की अपेक्षा समवहत (समुदघात वाले) जीव संख्यातगुणे अधिक हैं, क्योंकि बहुत-से पर्याप्तक और अपर्याप्तक जीव सदा मारणान्तिक समुद्घात करते हुए पाए जाते हैं। समवहत जीवों से सातावेदक जीव संख्यातगुणे हैं; क्योंकि आयुष्यबन्धक, अपर्याप्त और सुप्त जीवों में भी साता का वेदन करने वाले उपलब्ध होते हैं। सातावेदकों की अपेक्षा इन्द्रियोपयुक्त जीव संख्यातगुणे अधिक हैं, क्योंकि इन्द्रियों का उपयोग लगाने वाले सातावेदकों के अतिरिक्त असातावेदकों में भी पाए जाते हैं। उनकी अपेक्षा Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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