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________________ 258 ] [ प्रज्ञापनासूत्र [274 प्र.] भगवन् ! इन चरम और अचरम जीवों में से कौन किनसे अल्प, बहुत, तुल्य अथवा विशेषाधिक हैं ? [274 उ.] गौतम ! अचरम जीव सबसे थोड़े हैं, (उनसे) चरम जीव अनन्तगुणे हैं / बावीसवाँ (चरम) द्वार / / 22 // विवेचन-बावीसवाँ चरमद्वार--चरम और अचरम जीवों का अल्पबहुत्व-चरम प्रौर प्रचरम की व्याख्या--जिन जीवों का इस संसार में चरम-अन्तिम भव (जन्म-मरण) संभव हैं, वे चरम कहलाते हैं अथवा जो जीव योग्यता से भी चरम भव (निश्चितरूप से मोक्ष) के योग्य हैं, वे भव्य भी चरम कहलाते हैं। अचरम (चरमभव के अभाव वाले) अभव्य हैं या जिनका अब चरमभव (शेष) नहीं हैं, वे अचरम-सिद्ध कहलाते हैं। चरम और अचरम का अल्पबहुत्व-सबसे कम अचरम जीव हैं, क्योंकि अभव्य और सिद्ध, दोनों प्रकार के अचरम मिलकर भी अजघन्योत्कृष्ट अनन्त होते हैं; जबकि उभयविध चरम (चरमशरीरी तथा भव्यजीव) उनकी अपेक्षा अनन्तगुणे हैं, क्योंकि वे अजघन्योत्कृष्ट अनन्तानन्तपरिमाण हैं।' तेईसवाँ जीवद्वार : जीवादि का अल्पबहुत्व 275. एतेसि णं भंते ! जीवाणं पोग्गलाणं प्रद्धासमयाणं सव्वदव्वाणं सवपदेसाणं सव्वपज्जवाण य कतरे कतरेहितो अप्पा वा बहुया वा तुल्ला वा विसेसाहिया वा? गोयमा ! सम्वत्थोवा जीवा 1, पोग्गला अणतगुणा 2, प्रद्धासमया अणंतगुणा 3, सव्वदव्वा विसेसाहिया 4, सम्वपदेसा प्रणतगुणा 5, सव्वपज्जवा प्रणतगुणा 6 / दारं 23 // [275 प्र.] भगवन् ! इन जीवों, पुद्गलों, अद्धा-समयों, सर्वद्रव्यों, सर्वप्रदेशों और सर्वपर्यायों में से कौन किनसे अल्प, बहुत, तुल्य अथवा विशेषाधिक हैं ? [275 उ.] गौतम ! 1. सबसे अल्प जीव हैं, 2. (उनसे) पुद्गल अनन्तगुणे हैं, 3. (उनसे) अद्धा-समय अनन्तगुणे हैं, 4. (उनसे) सर्वद्रव्य विशेषाधिक हैं, 5. (उनसे) सर्वप्रदेश अनन्तगुणे हैं (और उनसे भी) 6. सर्वपर्याय अनन्तगुणे हैं / तेईसवाँ (जीव) द्वार // 23 // विवेचन-तेईसवाँ जीवद्वार-प्रस्तुत सूत्र (275) में जीव, पुद्गल, काल, सर्वद्रव्य, सर्वप्रदेश और सर्वपर्याय, इनके परस्पर अल्पबहुत्व का निरूपण किया गया है / जीवादि के अल्पबहत्व को युक्तिसंगतता-सबसे कम जीव, उनसे अनन्तगुणे पुद्गल तथा उनसे भी अनन्तगुणे काल (श्रद्धासमय), इस सम्बन्ध में पूर्वोक्त युक्ति से विचार कर लेना चाहिए। प्रद्धासमयों से सर्वद्रव्य विशेषाधिक हैं, क्योंकि पुद्गलों से जो श्रद्धासमय अनन्तगुणे कहे गए हैं, वह प्रत्येक प्रद्धासमय द्रव्य हैं, अतः द्रव्य के निरूपण में वे भी ग्रहण किये जाते हैं / साथ ही अनन्त जीव. द्रव्यों, समस्त पुद्गल द्रव्यों, धर्म,अधर्म एवं आकाशास्तिकाय, इन सभी का द्रव्य में समावेश हो जाता है, ये सभी मिल कर भी अद्धासमयों से अनन्तवें भाग होने से उन्हें मिला देने पर भी सर्वद्रव्य, अद्धासमयों से विशेषाधिक हैं। उनकी अपेक्षा सर्वप्रदेश अनन्तगुणे हैं, क्योंकि अाकाश अनन्त है। 1. प्रज्ञापनासूत्र, मलय. वृत्ति, पत्रांक 143 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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