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________________ 234] [प्रज्ञापनासूत्र [3] एएसि णं भंते ! सुहमाउकाइयाणं बादराउकाइयाण य पज्जत्ताऽपज्जत्ताणं कतरे कतरेहितो अप्पा वा बहुया वा तुल्ला वा विसेसाहिया वा ? गोयमा ! सम्वत्थोवा बादराउकाइया पज्जत्तया 1, बादरग्राउकाइया अपज्जत्तया असंखेज्जगुणा 2, सुहुमनाउकाइया अपज्जत्तया असंखेज्जगुणा 3, सुहमप्राउकाइया पज्जत्तया संखेज्जगुणा 4 // [250-3 प्र.] भगवन् ! इन सूक्ष्म अप्कायिकों और बादर अप्कायिकों के पर्याप्तकों और अपर्याप्तकों में से कौन किनसे अल्प, बहुत, तुल्य अथवा विशेषाधिक हैं ? [250-3 उ.] गौतम ! 1. सबसे अल्प बादर अप्कायिक-पर्याप्तक हैं, 2. (उनसे) बादर अप्कायिक-अपर्याप्तक असंख्यातगुणे हैं; 3. (उनसे) सूक्ष्म अप्कायिक-अपर्याप्तक असंख्यातगुणे हैं (और उनसे भी) 4. सूक्ष्म अप्कायिक-पर्याप्तक संख्यातगुणे हैं। [4] एएसि णं भंते ! सुहुमतेउकाइयाणं बादरतेउकाइयाण य पज्जत्ताऽपज्जत्ताणं कतरे कतरहितो अप्पा वा बहुया वा तुल्ला वा विसेसाहिया वा ? गोयमा! सव्वत्थोवा बादरतेउकाइया पज्जत्तगा 1, बादरतेउकाइया अपज्जत्तगा असंखेज्जगुणा 2, सुहुमतेउकाइया अपज्जत्तगा असंखेज्जगुणा 3, सुहुमतेउकाइया पज्जत्तगा संखेज्जगुणा 4 / [250-4 प्र.] भगवन् ! इन सूक्ष्म तेजस्कायिकों और बादर तेजस्कायिकों के पर्याप्तकों और अपर्याप्तकों में से कौन किनसे अल्प, बहुत, तुल्य अथवा विशेषाधिक हैं ? [250-4 उ.] गौतम ! 1. सबसे कम बादर तेजस्कायिक-पर्याप्तक हैं, 2. (उनसे) बादर तेजस्कायिक-अपर्याप्तक असंख्यातगुण हैं, 3. (उनसे) सूक्ष्म तेजस्कायिक-अपर्याप्तक असंख्यातगुणे हैं, 4. (उनसे भी)सूक्ष्म तेजस्कायिक-पर्याप्तक संख्यातगुणे हैं। [5] एएसि गं भंते सुहुमवाउकाइयाणं बादरवाउकाइयाण य पज्जत्ताऽपज्जत्ताणं कतरे कतरेहितो अप्पा वा बहुंया वा तुल्ला वा विसेसाहिया वा ? गोयमा ! सम्वत्थोवा बादरवाउकाइया पज्जत्तया 1, बादरवाउकाइया अपज्जत्तया असंखेज्जगुणा 2, सुहुमवाउकाइया अपज्जत्तया असंखेज्जगुणा 3, सुहुमवाउकाइया पज्जत्तया संखेज्जगुणा 4 / [250-5 प्र.] भगवन् ! इन सूक्ष्म वायुकायिकों तथा बादर वायुकायिकों के पर्याप्तकों और अपर्याप्तकों में से कौन किनसे अल्प, बहुत, तुल्य अथवा विशेषाधिक हैं ? [250-5 उ.] गौतम ! 1. सवसे थोड़े बादर वायुकायिक-पर्याप्तक हैं, 2. (उनसे) बादर वायुकायिक-अपर्याप्तक असंख्यातगुणे अधिक हैं, 3. (उनसे) सूक्ष्म वायुकायिक अपर्याप्तक हैं, 4. (और उनसे भी) सूक्ष्म वायुकायिक-पर्याप्तक संख्यातगुणे हैं / [6] एएसि णं भंते ! सुहुमवणस्सतिकाइयाणं बादरवणस्सतिकाइयाण य पज्जत्ताऽपज्जत्ताणं कतरे कतरोहितो अध्या वा बहुया वा तुल्ला वा विसेसाहिया वा? Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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