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________________ [प्रज्ञापनासूत्र प्रज्ञापनासूत्र (मूलपाठ-टिप्पणसहित) में अन्य प्रतियों के अनुसार तीन पद अधिक अंकित किये गए हैं-यथा 13. सकायिक अप्तिक विशेषाधिक हैं, 14. (उनसे) सकायिक पर्याप्तक (बीच में वनस्पति कायिक पर्याप्तक संख्यातगुणे हैं के पश्चात्), विशेषाधिक हैं, तथा 15. सकायिक विशेषाधिक हैं।' कायद्वार के अन्तर्गत सूक्ष्म-बादरकायद्वार 237. एतेसि णं भंते ! सुहमाणं सुहमपुढविकाइयाणं सुहुमाउकाइयाणं सुहुमतेउक्काइयाणं सुहुमवाउकाइयाणं सुहुमवणफइकाइयाणं सुहमणिओयाण य कतरे कतरेहितो अप्पा वा बहुया वा तुल्ला वा विसेसाहिया वा ? . गोयमा ! सम्वत्थोवा सुहुमतेउकाइया 1, सुहमपुढविकाइया विसेसाहिया 2, सुहुमप्राउकाइया विसेसाहिया 3, सुहुमवाउकाइया विसेसाहिया 4, सुहमनिगोदा असंखेज्जगुणा 5, सुहुमवणप्फइकाइया अणंतगुणा 6, सुहमा विसेसाहिया 7 / 237 प्र.] भगवन् ! इन सूक्ष्म, सूक्ष्म पृथ्वीकायिक, सूक्ष्म अप्कायिक, सूक्ष्म तेजस्कायिक, सूक्ष्म वायुकायिक, सूक्ष्म वनस्पतिकायिक एवं सूक्ष्मनिगोदों में से कौन किनसे अल्प, बहुत, तुल्य अथवा विशेषाधिक हैं ? [237 उ.] गौतम ! 1. सबसे अल्प सूक्ष्म तेजस्कायिक हैं, 2. (उनसे) सूक्ष्म पृथ्वीकायिक विशेषाधिक हैं, 3. (उनसे) सूक्ष्म अप्कायिक विशेषाधिक हैं, 4. (उनसे) सूक्ष्म वायुकायिक विशेषाधिक हैं, 5. (उनसे) सूक्ष्म निगोद असंख्यातगुणे हैं, 6. (उनसे) सूक्ष्म वनस्पतिकायिक अनन्तगुणे हैं और 7. (उनसे भी) सूक्ष्म जीव विशेषाधिक हैं। 238. एतेसि गं भंते ! सुहमअपज्जत्तगाणं सुहुमपुढविकाइयापज्जतयाणं सुहुमनाउकाइयापज्जत्तयाणं सुहुमतेउकाइयापज्जत्तयाणं सुहुमवाउकाइयापज्जत्तयाणं सुहुमवणप्फइकाइयापज्जत्तयाणं सुहमणिगोदापज्जत्तयाण य कतरे कतरेहितो अप्पा वा बहुया वा तुल्ला वा विसेसाहिया वा ? गोयमा ! सव्वत्थोवा सुहुमतेउकाइया अपज्जत्तया 1, सुहमपुढविकाइया अपज्जत्तया विसेसा. हिया 2, सुहुमनाउकाइया अपज्जत्तया विसेसाहिया 3, सुहुमवाउकाइया अपज्जत्तया विसेसाहिया 4, सुहुमनिगोदा अपज्जत्तगा असंखेज्जगुणा 5, सुहुमवणफतिकाइया अपज्जत्तगा प्रणतगुणा 6, सुहमा अपज्जत्तगा विसेसाहिया 7 / [238 प्र.] भगवन् ! इन सूक्ष्म अपर्याप्तक, सूक्ष्म पृथ्वीकायिक अप्तिक, सूक्ष्म अप्कायिक अपर्याप्तक, सूक्ष्म तेजस्कायिक अपर्याप्तक, सूक्ष्म वायुकायिक अपर्याप्तक, सूक्ष्म वनस्पतिकायिक अपर्याप्तक, सूक्ष्म निगोद अपर्याप्तक जीवों में से कौन किनसे अल्प, बहुत, तुल्य अथवा विशेषाधिक हैं ? 1. (क) प्रज्ञापना. म. वृत्ति, पत्रांक 124 (ख) पण्णवणासुत्तं (मूलपाठ-टिप्पणयुक्त) भा. 1, पृ. 88 (ग) प्रज्ञापनासूत्र (प्रमेयबोधिनी टीका) भाग. 2, पृ. 74 एवं 92 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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