________________ [189 द्वितीय स्थानपद कल्पों के अवतंसकों का रेखाचित्र कल्प का नाम मध्य में पूर्वदिशा में | दक्षिण दिशा में पश्चिमदिशा में उत्तरदिशा में | सौधर्मकल्प सौधर्मावतंसक अशोकावतंसक सप्तपर्णावतंसक चम्पकावतंसक चतावतंसक | सनत्कुमारकल्प सनत्कुमारावतंसक | ब्रह्मलोककल्प ब्रह्मलोकावतंसक | महाशुक्रकल्प महाशुक्रावतंसक | (मानत) प्राणतकल्प प्राणतावतंसक ईशानकल्प ईशानावतंसक अंकावतंसक स्फटिकावतंसक | रत्नावतंसक जातरूपावतंसक माहेन्द्रकल्प माहेन्द्रावतंसक लान्तककल्प लान्तकावतंसक | सहस्रारकल्प सहस्रारावतंसक (11) (प्रारण) अच्युतकल्प अच्युतावतंसक 'अणिदा' प्रादि शब्दों को व्याख्या-णिदा' = जिन देवों के कोई इन्द्र यानी अधिपति नहीं है, वे अनिन्द्र / 'प्रपेस्सा'—जिनके कोई दास या भृत्य नहीं है, वे अप्रेष्य / 'अपुरोहिया'—जिनके कोई पुरोहित-शान्तिकर्म करने वाला नहीं होता, वे अपुरोहित हैं, क्योंकि इन कल्पातीत देवलोकों को किसी प्रकार की अशान्ति नहीं होती। 'प्रहमिदा' = 'अहमिन्द्र', जिनमें सबके सब स्वयं इन्द्र हों, वे अहमिन्द्र कहलाते हैं।' तात्पर्य यह है कि बारह कल्पों में जैसा स्वामी-सेवक आदि का भेद होता है, वैसा भेद नवअवेयकों एवं अनुत्तरविमानों के देवों में नहीं है / वहाँ के सभी देवों को ऋद्धि प्रादि समान है, अतएव सभी अपने को इन्द्र-जैसा (स्वाधीन) अनुभव करते हैं / हाँ, सर्वार्थसिद्ध विमान को छोड़ कर उनकी आयु में अन्तर हो सकता है। 211. कहि णं भंते ! सिद्धाणं ठाणा पण्णता ? कहि णं भंते ! सिद्धा परिवसंति ? गोयमा ! सम्वट्ठसिद्धस्स महाविमाणस्स उबरिल्लानो थूभियग्गाम्रो दुवालस जोयणे उड्ढं प्रबाहाए एत्थ णं ईसीपब्भारा णामं पुढवी पण्णत्ता, पणतालीसं जोयणसतसहस्साणि प्रायाम१. प्रज्ञापना. मलय. वृत्ति, पत्रांक 105-106 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org