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________________ द्वितीय स्थानपद ] [169 . 193. [1] कहि णं भंते ! अणवनियाणं देवाणं [पज्जत्ताऽपज्जत्ताणं] ठाणा पण्णत्ता ? कहि णं भंते ! प्रणवणिया देवा परिवसंति ? गोयमा ! इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए रयणामयस्स कंडस्स जोयणसहस्सबाहल्लस्स उरि हेटा य एगं जोयणसयं वज्जेत्ता मज्झे अहसु जोयणसतेसु, एत्थ णं अणवष्णियाणं देवाणं तिरियमसंखेज्जा णगरावाससयसहस्सा भवंतीति मक्खातं / ते णं जाव (सु. 188) पडिरूवा। एत्थ णं प्रणवणियाणं देवाणं ठाणा। उववाएणं लोयस्स असंखेज्जइभागे, समुग्घाएणं लोयस्स असंखेज्जइभागे, सटाणेणं लोयस्स असंखेज्जइभागे / तत्थ णं बहवे प्रणवनिया देवा परिवसंति महड्डिया जहा पिसाया (सु. 186[1]) जाव विहरंति / __[193-1 प्र.] भगवन् ! पर्याप्तक और अपर्याप्तक अणपणिक देवों के स्थान कहाँ कहे गए हैं ? भगवन् ! अणपणिक देव कहाँ निवास करते हैं ? [193-1 उ.] गौतम ! इस रत्नप्रभापृथ्वी के एक हजार योजन मोटे रत्नमय काण्ड के ऊपर और नीचे एक-एक सौ योजन छोड़ कर मध्य में आठ-सौ योजन (प्रदेश) में, अणपणिक देवों के तिरछे असंख्यात लाख नगरावास हैं, ऐसा कहा गया है। वे नगरावास (सू. 188 के अनुसार) यावत् प्रतिरूप तक पूर्ववत् समझने चाहिए / इन (पूर्वोक्त स्थानों) में अणपणिक देवों के स्थान हैं / (वे स्थान) उपपात की अपेक्षा से लोक के असंख्यातवें भाग में हैं, समुद्घात की अपेक्षा से लोक के असंख्यातवें भाग में हैं, स्वस्थान की अपेक्षा से भी लोक के असंख्यातवें भाग में हैं। वहाँ बहुत-से अणपणिक देव निवास करते हैं, वे महद्धिक हैं, (इत्यादि आगे का समग्र वर्णन) (सू. 186-1 में) जैसे पिशाचों का वर्णन है, तदनुसार यावत् 'विचरण करते हैं (विहरंति) तक (समझना चाहिए।) [2] सन्निहिय-सामाणा यऽस्थ दुवे अणणिदा प्रणवणियकुमाररायाणो परिबसंति महिड्डीया जहा काल-महाकाला (सु. 186 [2]) / [193-2] इन्हीं (पूर्वोक्त स्थानों) में दोनों अणपणिकेन्द्र अणपणिककुमारराज-सन्निहित और सामान निवास करते हैं, जो कि महद्धिक हैं, (इत्यादि सारा वर्णन सू. 186-2 में वर्णित) काल और महाकाल की तरह (समझना चाहिए / ) 164. एवं जहा काल-महाकालाणं दोण्हं पि दाहिणिल्लाणं उत्तरिल्लाण य भणिया (सु. 160 [2],161[2]) तहा सन्निहिय-सामाणाई णं पि भाणियव्वा / संगहणिगाहा प्रणवन्निय 1 पणवन्निय 2 इसिवाइय 3 भूयवाइया चेव 4 / कंद 5 महाकंदिय 6 कुहंडे 7 पययदेवा 8 इमे इंदा / / 151 // सणिहिया सामाणा 1 धाय विधाए 2 इसी य इसिपाले 3 / ईसर महेसरे या 4 हवइ सुवच्छे विसाले य 5 // 152 // हासे हासरई वि य 6 सेते य तहा भवे महासेते 7 / पयते पययपई वि य 8 नेयन्वा प्राणुपुवीए // 153 // Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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