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________________ 166 [प्रज्ञापनासूत्र अपनी अग्नमहिषियों का, अपनी-अपनी परिषदों का, अपनी-अपनी सेनाओं का, अपने-अपने सेनाधिपति देवों का, अपने-अपने आत्मरक्षक देवों का और अन्य बहुत-से वाणव्यन्तर देवों और देवियों का आधिपत्य, पौरपत्य, स्वामित्व, भर्तृत्व, महत्तरकत्व, आजैश्वरत्व एवं सेनापतित्व करते-कराते तथा उनका पालन करते-कराते हुए वे (वाणव्यन्तर देवगण) महान् उत्सव के साथ नृत्य, गीत और वीणा, तल, ताल (कांसा), त्रुटित, घनमृदंग आदि वाद्यों को बजाने से उत्पन्न महाध्वनि के साथ दिव्य उपभोग्य भोगों को भोगते हुए रहते हैं / 186. [1] कहि णं भंते ! पिसायाणं देवाणं पज्जत्ताऽपज्जत्ताणं ठाणा पण्णत्ता ? कहि गं भंते ! पिसाया देवा परिवसंति ? गोयमा ! इमीसे रयणप्यमाए पुढवीए रयणामयस्स कंडस्स जोयणसहस्सबाहल्लस्स उरि एग जोयणसतं प्रोगाहित्ता हेढा वेगं जोयणसतं वज्जेत्ता मज्झे अट्टस जोयणसएस, एस्थ णं पिसायाणं देवाणं तिरियमसंखेज्जा भोमेज्जणगरावाससतसहस्सा भवंतीति मक्खातं / ते णं भोमेज्जणगरा बाहिं वट्टा जहा प्रोहियो भवणवण्णमो (सु. 177) तहा भाणितन्वो जाव पडिरूबा। एत्थ णं पिसायाणं देवाणं पज्जत्ताऽपज्जत्ताणं ठाणा पण्णत्ता / तिसु वि लोगस्स असंखेज्जइमागे / तत्थ णं बहवे पिसाया देवा परिवसंति महिड्ढिया जहा प्रोहिया जाव (सु. 188) विहरंति / [189-1 प्र.] भंते ! पर्याप्तक और अपर्याप्तक पिचाश देवों के स्थान कहाँ कहे गए हैं ? भगवन् ! पिशाच देव कहाँ रहते हैं ? [189-1 उ.] गौतम ! इस रत्नप्रभापृथ्वी के एक हजार योजन मोटे रत्नमय काण्ड के ऊपर के एक सौ यौजन (प्रदेश) को अवगाहन (पार) करके तथा नीचे एक सौ योजन (प्रदेश) को छोड़कर, बीच के आठ सौ योजन (प्रदेश) में, पिशाच देवों के तिरछे असंख्यात भूगृह के समान लाखों (भौमेय) नगरावास हैं, ऐसा कहा है। वे भौमेय नगर (नगरावास) बाहर से गोल (वर्तुल), हैं, इत्यादि सब वर्णन जैसे सू. 177 में सामान्य भवनों का कहा, वैसा ही यहाँ यावत् 'प्रतिरूप हैं' तक कहना चाहिए / इन (नगरावासों) में पर्याप्तक और अपर्याप्तक पिशाच देवों के स्थान कहे गए हैं / (वे स्थान) तीनों (पूर्वोक्त) अपेक्षाओं से लोक के असंख्यातवें भाग में हैं ; जहाँ कि बहुत-से पिशाच देव निवास करते हैं। जो महद्धिक हैं, (इत्यादि सब वर्णन) जैसे (सू. 188 में) सामान्य वाणव्यन्तरों का कहा गया है, वैसे ही यहाँ यावत् 'विचरण करते हैं' (विहरंति) तक जान लेना चाहिए। [2] काल-महाकाला यऽथ दुहे पिसायइंदा पिसायरायाणो परिवसंति महिड्ढिया महज्जुइया जाव (सु. 188) विहरति / [189-2] इन्हीं (पूर्वोक्त नगरावासों) में जो दो पिशाचेन्द्र पिशाचराज - काल और महाकाल, निवास करते हैं, वे 'महद्धिक हैं, महाद्युतिमान हैं,' इत्यादि आगे का समस्त वर्णन, यावत् 'विचरण करते हैं' ('विहरंति') तक सू. 188 के अनुसार कहना चाहिए। 190. [1] कहि णं भंते ! दाहिणिल्लाणं पिसायाणं देवाणं पज्जत्ताऽपज्जत्ताणं ठाणा पण्णता? कहि णं भंते ! दाहिणिल्ला पिसाया देवा परिवसंति ? Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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