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________________ द्वितीय स्थानपद ] [ 145 नारकावासों की भूमि---नारकावासों का भूमितल कंकरीला होने पर भी नारकों के पैर रखने पर कंकड़ों का स्पर्श ऐसा लगता है, मानो छुरे से पैर कट गए हों। उनमें प्रकाश का अभाव होने से सदैव गाढ़ अन्धकार व्याप्त रहता है। बादलों से आच्छादित काली घोर रात्रि की तरह वहाँ सदैव अन्धकार रहता है; क्योंकि प्रकाशक ग्रह-सूर्य-चन्द्रादि का या उनकी प्रभा का वहाँ अभाव है। वहाँ मेद, चर्बी, मवाद, रक्त, मांस प्रादि दुर्गन्धित वस्तुओं के कीचड़ से भूमितल व्याप्त रहता है, इसलिए वे नारकावास सदैव गंदे, धुणित या दुर्गन्धयुक्त रहते हैं। मरी हुई गाय, भैंस आदि के कलेवरों की-सी दुर्गन्ध से भी अत्यन्त अनिष्ट घोर दुर्गन्ध वहाँ रहती है / धौंकनी से लोहे को खूब धौंकने पर जैसे गहरे नीले रंग की (कपोत के रंग-जैसी) ज्वाला निकलती है, वैसी ही आभा वाले नारकावास होते हैं, क्योंकि नारकों के उत्पत्तिस्थान को छोड़ कर वे सर्वत्र उष्ण होते हैं। यह कथन छठी-सातवीं पृथ्वी के सिवाय अन्यपृथ्वियों के विषय में समझना चाहिए। आगे कहा जाएगा कि छठी और सातवीं नरक के नारकावास कापोतवर्ण की अग्नि के वर्ण-सदृश नहीं होते / उन नारकावासों का स्पर्श तलवार की धार के समान अतीव कर्कश और दुःसह होता है। वे देखने में भी अत्यन्त अशुभ होते हैं। उन नरकों की बेदनाएँ भी दुःसह शब्द, रूप, गन्ध, रस और स्पर्श के कारण अतीव अशुभ या असुखकर होती हैं। नारकों को शरीररचना, प्रकृति और परिस्थिति–वे रंग से काले-कलूटे और भयंकर होते हैं। उनके शरीर से काली प्रभा निकलती है। उनको देखने मात्र से रोमांच हो जाता है, अथवा वे दूसरे नारकों में अत्यन्त भय उत्पन्न करके रोमांच खड़ा कर देते हैं। इस कारण वे अत्यन्त आतंक पैदा करते रहते हैं। तथा वे सदैव भयभीत, त्रस्त, आतंकित, उद्विग्न रहते हैं, तथा सतत अनिष्ट नरकभय का अनुभव करते रहते हैं।' पंचेन्द्रिय तिर्यञ्चयोनिकों के स्थानों की प्ररूपरणा 175. कहि णं भंते ! पंचिदियतिरिक्खजोणियाणं पज्जत्ताऽपज्जताणं ठाणा पण्णत्ता ? गोयमा ! उड्ढलोए तदेवकदेसभाए 1, अहोलोए तदेक्कदेसभाए 2, तिरियलोए अगडेसु तलाएसु नदीसु दहेसु वावीसु पुक्खरिणीसु दीहियासु गुंजालियासु सरेसु सरपंतियासु सरसरपंतियासु बिलेसु बिलपंतियासु उज्झरेसु निझरेसु चिल्ललेसु पल्ललेसु वप्पिणेसु दोवेसु समुद्देसु सम्वेसु चेव जलासएसु जलढाणेसु 3, एत्थ णं पंचेंदियतिरिक्खजोणियाणं पज्जत्ताऽपज्जत्ताणं ठाणा पण्णत्ता। उववाएणं लोयस्स असंखेज्जइभागे, समुग्धाएणं लोयस्स असंखेज्जइभागे, सटाणेणं लोगस्स असंखेज्जइभागे। [175 प्र.] भगवन् ! पर्याप्त और अपर्याप्त पंचेन्द्रियतिथंचों के स्थान कहाँ (-कहाँ) कहे गए हैं ? [175 उ.] गौतम ! 1. ऊर्ध्वलोक में उसके एकदेशभाग में, 2. अधोलोक में उसके एकदेशभाग में, 3. तिर्यग्लोक में कुओं में, तालाबों में, नदियों में, वापियों में, द्रहों में, पुष्करिणियों में, दीपिकाओं में, गुजालिकाओं में, सरोवरों में, पंक्तिबद्ध सरोवरों में, सर-सर-पंक्तियों में, बिलों में, पंक्तिबद्ध बिलों में, पर्वतीय जलस्रोतों में, झरनों में, छोटे गड्ढों में, पोखरों में, क्यारियों अथवा खेतों 1. प्रज्ञापनासूत्र मलय. वृत्ति. पत्रांक 80-81 का सारांश Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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